तो फिर सोचिये क्या होगा कल भारत का भविष्य ,क्या होगा भारत का राजनितिक भविष्य क्या कोई युवा राजनीती में आगे आयेगा या नही .......सोचे और लिखे ...........
Wednesday, May 13, 2009
"पीत राजनीती "
Sunday, May 10, 2009
"कथित कृषि प्रधान देश"
आज पुरा भारत चुनाव की आग में जल रहा है ,और वही किसी मलिन बस्ती में किसी गरीब का पेट भूख की आग में जल रहा है , लकिन किसी को क्या फिक्र ,सब तो अपनी स्वार्थ की रोटियों को इन भूखे पेट की आग में पकाने में लगा हुआ है । आज भारत सरकार दावे करती है की देश की विकास दर ८-९ है ,जबकि देश की कृषि व्यवस्था दिन - प्रतिदिन खस्ता होती जा रही है । आज हमारे यहाँ लोकतंत्र की जोड़ तोड़ चल रही है , पैसा पानी की तरह बहाया जा रहा है ,लेकिन कृषि की सुध लेने वाला कोई नही दिन प्रतिदिन गहूं की पैदावार गिरती जा रही है । किसान बदहाल है कृषि यंत्रो ,उन्नत बीजों, अच्छे उर्वरको के दाम दिन-बा-दिन बढ़ते जारहे है । चावल उत्पादन में भी गिरावट आई है । सरकार अगले ५ सालों में इन सब के उत्पादन पे ज़ोर दे रही है । लेकिन यह सरकारी प्रयास कितना सफल हो पायेगा ये कहना कठिन है । वर्तमान हालत हे इतने कठिन है की भविष्य की कल्पना कर के ही सिहरन दौड़ जाती है । संयोक्त राष्ट्र अमेरिका की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में २६ करोड़ भूखे है । हालाँकि एक राष्ट्रिय सर्वेछ्द के अनुसार भारत में २६ करोड़ से ज़्यादा की आबादी भूख मरी का शिकार है । इन्हे ही गरीबी रेखा से नीचे का आदमी बताया जाता है । जब भारत का एक उद्योगपति (मुकेश अम्बानी ) दुनिया का सबसे धनि बन चुका है ,तब भारत की एक चौथाई आबादी की इस दुर्गति से भारत के असमान विकास को समझा जा सकता है । ऊनेसको की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में ४७% बच्चे कुपोषद के शिकार है ।
भारत में कृषि ,किसान, खित-मजदूर, ग्रामीण-विकास ,सिचाई,सस्ते और उत्तम बीज,प्राकृतिक खाद,प्राकृतिक-बिजली आदि पर दयां नही केन्द्रित किया तो आगामी वर्षों में भूख मरी और भूखो के विद्रोह बहुत ही तेज़ी से विस्तार होगा और इस कथित कृषि प्रधान देश को रसातल में जाने से रोकना कठिन होगा ..............
तो फिर जागिये क्योंकि कब ये भूखमरी आप को अपना शिकार बनाएगी पता नही ...............
Tuesday, May 5, 2009
"लावारिस लाश"
अब चुनाव खत्म होने वाला है । कितने ही महारथियों का भाग्य एल्क्ट्रोनिक वोटिंग मशीन में बंद हो चुका है । चुनाव आयोग काफी खुश है । हर जगह चुनाव बिना हिंसा के हो रहे है अगर पहले चरण को छोड़ दे तो कही कुछ भी नही हुआ । लकिन चुनाव आयोग का डंडा उन मासूमो पर भी पड़ा है ,जो इस महापर्व का बेसब्री से इंतज़ार करते hai । हाँ........... वो गरीब और बेसहारा है जो कभी खाली पेट सोते है या कभी पानी पी के उनके लिए ये चुनाव खुशियाँ लेकर आता था । लेकिन अब बैनर ,पोस्टर पर चुनाव आयोग ने अपना चाबुक चला दिया है जो सीधे उस गरीब के ऊपर चल रहा है । पर सरकार का क्या उसे कोई मरता है तो की क्या फर्क पड़ता है । उसकी रोटी जनता को झूठे वादे देकर पकती है ।
मुझे एक कहानी याद आरही है ..........एक -एक बिरजू उठा और अपनी पत्नी से बोला तो सो जाना मेरे आने का इंतज़ार मत करना । धनिया बोली "तो का जरूरत है जावे की " पर बिरजू की नज़र उसकी फटी साडी पर पद चुकी थी । आज बिरजू जब कम करने के बाद एक पार्टी कार्यालय पर पंहुचा तो वह आधिक से अधिक बैनर - पोस्टर अपने रिक्षे में भर लेना चाहता था । वह जगह जगह पोस्टर बैनर बांधता चल रहा था । आखरी बैनर बंधना बाकी था ....उसका पहला सिरा दीवार के कुंदे में बंधने के बाद दूसरा किनारा बंधने के लिए जैसे ही सड़क किनारे लगे ट्रांसफार्मर पर चढा एक भाम्म की आवाज़ आई और उसका लगभग जल चूका शरीर ज़मीन पर आकर गिरा । एक शोर हुआ और पार्टी प्रत्याशी अपने कार्यकर्ताओं के साथ वहा पहुच गए । किसी ने कहा मालिक ये तो मर गया वो बोला "अबे जल्दी से बैनर उतार किसी ने देख लिया तो मुद्दा बना देगा " जल्दी जल्दी बैनर उतरा गया । लाश को कही दूर फैंक दो कौन पूछेगा "लावारिस लाश" को .................
तो आप ही बताये ये सरकार का दोष है की उसने ये काम बंद कर दिया ..............................................
याफिर उन पार्टियों का जो इन्हें सिर्फ लाभ के लिए काम देते है वरना फिकवा देते है " लावारिस लाश "कही सुनसान में जहा किसे की नज़र न पड़े .......................
Saturday, May 2, 2009
व्हाट डिड वी डू टीवी वाज़ अब्सेंट फ्रॉम ऑवर लाइफ
Albeit a little frustrating, because the home team lost in the final moments. But today an entire day withered away in the name of IPL. Two games of equal interest and excitement. Lunch and dinner without moving anywhere, right in front of you and in front of the ‘idiot’ and many finger nails losing their bite - heart rates an all time high and all !!
What did we do when TV was absent from our lives ? How did we occupy ourselves ?
Its become our most earnest and sincere friend, this tube device. Nothing to talk about put on the TV. Waiting on something, put on the TV. All alone and no company, put on the TV. What’s the situation in the country, put on the TV. What’s the situation in the world, put on the TV. Weather, TV. Sport, TV. Film, TV. History documentation, TV. Want to get slumber, TV…
There is just no end to it. A boon in our lives. And pretty soon we shall be carrying it around with us on our mobiles !!
So, yes a really lazy uncoordinated and mindless day. Allowed the brain to rest and recover. For a challenge tomorrow and hopefully many more tomorrows.
Abhishek won a recognition and left for Delhi. NDTV nominated him for the best Brand representative and rewarded him at a ceremony, for his campaign for IDEA Cellular and Motorolla. He seemed happy about it, as did his clients. And we feel happy for him.
Tomorrow is voting day in our part of the city and we are all geared up to be there and cast it. TV and print media are full of nothing else but possibilities and analysis on the prospects of various parties and candidates. I do not find that too odd. The elections in India make interesting information even in other parts of the world. We are the largest democracy in the world. We are among the two fastest developing nations in the world. We are among the very very few in the world that have not been as severely hit by the recession as others in the western world have. And come May 16th, we shall have a new Government for the next 5 years, so help me God. One never knows politics, entirely.
There has been talk among certain media of wanting to carry my blog in their paper. That I come to an understanding with them that I allow them to publish it exclusively. The deal being that the blog shall, as a result of the vast circulation of the paper, give me and my posts a larger reach to the people of the country.
I ask you .. put in your vote for this exercise and tell me whether this is worth considering. I shall not name the house of media that wishes so, for, that would be unethical and premature because the information has yet not come from them. It has come to me from those that contribute to it.
My own reading of the situation is that this would tantamount to parting with my exclusivity to another entity and in turn therefore preventing access of it to other houses of the print and electronic media. We also do not know how the house would exploit this. Or if it exploited it, what conditions would it put. There were accusations in the beginning from them that I was being paid to write. When the denial from me threatened to take a more legalistic turn, their denial, a most apologetic denial, eventually came through. Today they are the ones that are instigating commerce into my blog. Strange are the ways of the world and of course of the media.
There is talk also of building ‘Star Diaries’ for the print media. A biweekly input from all the stars of their life and works during each day or week or month. I believe this is all emanating from the popularity that the blog from various stars is generating and the desire of the print to be in control of that as well. It is flattering to learn that an acknowledgement of independent internet, a medium I believe to be a most powerful one in the days and years to come, to be causing interest or discomfort to the traditional media.
‘Social and political life may soon be driven by the “network”‘
‘Top global public intellectuals, thanks to an online mobilisation of their followers, could use the network not only to transform online publishing but also to redefine public intellectual life in a digital age.’
These are interesting observations that I have quoted from a recognized forum, a forum that has a certain degree of authenticity and stance due to the practice of conducting in practical terms what it preaches.
You, dear reader, therefore, are fast becoming the reason and the condition for this change. Your contribution is vital in the furtherance of our medium; started quite innocuously to connect with well wishers. So, reason out when you consider your response. Your decision could change many other decisions !!
Saturday, April 18, 2009
"इंटरनेशनल प्लेयर लीग"
कुछ देर बाद मैंने उससे पूछा ........तुझे तो मैंने "इंडियन प्रेमेयर लीग" को कवर करने साऊथ अफ्रीका भेजा था न फ़िर तो वापस क्यों चला आया ......वो बोला -मैंने अच्छा किया जो चला आया वहां रहता तो मै अपने आप को रोक नही पाटा । मैंने उससे पूछा ऐसा क्या हो गया। उसने कहा.................
इंडियन प्रीमीयर लीग के कमिश्नर ललित मोदी ने इस के पहले सत्र की शुरुआत पर कहा था की ये लीग भारत के उन युवाओं को मौका देने के लिए है जो अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन सही से नही कर पाते । इसके द्वारा वो युवाओ को मौका देना चाहते थे । ताकि हमारे देश को एक मज़बूत टीम मिल सके ...........लेकिन क्या हुआ ,राजस्थान रोयल्स ने अपने ८ इंडियन खिलाडयों को टीम से बाहर का रास्ता दिखा दिया .जिसमे हमारे राज्य का क्रिकेट कैप्टन मोहमद कैफ भी शामिल है । वही उनकी देखी - देखा किंग्स ११ पंजाब ने भी अपने ४ युवा खिलाड़ियों को बाहर निकाल दिया । मुझे इस बात का बड़ा दुःख हुआ और मैं वापस आगया । .........
खैर मेरा कैमरा तो हमेशा ही कुछ न कुछ बोलता रहता है । लेकिन उसने आज एक बहुत अहम् मुद्दा उठाया है ...आप ख़ुद सोचिये क्या विदेशों में होने वाले काउंटी क्रिकेट में विदेशी कैप्टन होते है ...आप ख़ुद कहेंगे नही । तो फिर भारत की प्रीमियर लीग में शामिल ८ टीमो में ५ के कप्तान विदेशी क्यों ? क्या कभी सचिन या फिर द्रविड़ को किसी काउंटी क्लब ने कैप्टन नियुक्त किया है नही न तो फिर हमारे देश में ऐसा क्यों ? क्या हम आज भी उनके गुलाम है ........शायद इस बात से तो यही लगता है ।
अगर ऐसा ही होता रहा तो युवा वर्ग इससे भी किनारा कर लेगा ,और फ़िर वही समस्या सामने आएगी जो पहले थी । प्लेयर अपने घरों और गली क्रिकेट में अपना दम तोड़ देंगे । फिर खिलाड़ियों के चयन में सौदेबाजी शुरू हो जायेगी ............
तो ललित जी सचेत हो जाइये कल को ऐसा न हो की आपकी इंडियन प्रिमेयर लीग धीरे धीरे इंडियन प्लेयर लीग,इंडियन पैसा लीग , इंडियन परदेसी लीग होने के बाद अब ......"इंटरनेशनल प्लेयर लीग "न बन के रह जाए .........वरना न आप को दर्शक मिलेगा और नही पैसा ।
तो फिर सोचना शुरू कीजीये अभी ..................
Tuesday, April 14, 2009
"गली-गली सिम-सिम"
ख़त्म हो गया प्रसार प्रचार ......पहले चरण का मतदान कल ............ सभी प्रत्याशी घर घर जाकर मांग रहे है वोट .....
मेरे कैमरे ने मुझसे कहा फैज़ कल हमारी गली में एक प्रत्याशी आए थे ...वो हमसे वोट की अपील कर रहे थे । कह रहे थे हमें वोट दीजिये हम आपके सपनो का भारत आपको देंगे ....तभी किसी युवा की आवाज़ आई महोदय पिछली बार भी आप आए थे आप ने वोट माँगा था ....हमने दिया भी पर क्या हुआ ....क्या हमारे सपनो का भारत आप हमें दे पाए । तभी किसी ने उसे चुप करा दिया ...तो नेता जी बोले नही नही उसे बोलने दीजिये सही कह रहा है ...फिर उस युवा ने कहना शुरू किया ....आपने नौकरी दिलाने के वादे किए थे सब के सब धरे के धरे रह गए ....हमारे शहर की गलियां वैसे ही बज बजा रही है जैसे पहले थी ...तो फिर क्यों हम आप को वोट दे ....
अब बारी नेता जी की थी ...वो थोड़ा सोच के बोले...हमने सभी कामो को अमली जमा पहनने की कोशिश की लकिन राज्य सरकार हमारे कामो में रोड़ा अटकाती रही ...फिर क्या था फूट पड़ा युवाओ का गुस्सा ....नेता जी के समर्थक युवाओं शांत कराने लगे ......और फिर जो होता है वो तुम भी जानते हो फैज़ ...नेता जी को सर पर पैर रख कर भागना पड़ा ....
लकिन किसी ने सच ही कहा है की ...भारत के कर्ण धार है ये युवा अगर ये जाग गए तो फिर भारत को तरक्की करने से कोई रोक नही सकता । शायद इन युवाओं की शक्ति को पहचान कर ही दुष्यंत कुमार जी ने ये बात कही है ........
इस नदी के धार में ठंडी हवा आती तो है,
नाव जर्जर ही सही लहरों से टकराती तो है।
एक चिंगारी कही से ढूंढ लाओ दोस्तों,
इस दिए में तेल से भीगी हुई बाती तो है।...........
तो दोस्तों अब जाग जाओ क्योंकि चुनाव कल है दिल खोल के मतदान करो.........
Saturday, April 11, 2009
"क्या सोचते है ये लोग "
"क्या सोचते है ये लोग "
समाज में अलग-अलग वर्ग के प्रादी होते है । वे सामान्य जन से ज़रका हटकर नज़र आते है। उनकी सोच कुछ अलग तरह की होती है । जिनमे कुछ महान होते है । मेरा कैमरा कल एक अखबार की कटिंग पढ़ रहा था । जिसमें सुधा सिंह जी ने काफी दिलचस्प लेख लिखा था इनके बारे में तो आइये मिलते है ऐसे ही कुछ लोगो से ........
१- लेखक वर्ग - लेखक का नाम ही बेचारगी और मायूसी सेजुडा हुआ है इसके दिमाग में हमेश अपनी रचना के प्रकाशन से सम्बंधित बाते घूमती रहती है । वह सोचता है की वह जो भी रचना लिखे या छपने के लिए भेजे वह प्रकाशित हो जाये ।
वह सोचता है - संपादक की फिर जाये मति , मेरी रचना को मिल जाये गति
२- लेखिका वर्ग - आज कल की महिलाये भी कुछ कम भी नहीं समाज का आधा हिस्सा जिसमे से कुछ लेखिका वर्ग की होती है, यह भी अपनी रचनाये प्रकाशित होने के सपने देखती रहती है। कभी कभी इनकी रचनाये सुखेद वापस भी आ जाती है तब उसके दिल क्या गुजरती है उसकी इसी सोच को दर्शाती है यह पंक्तियाँ - काश ! की संपादक मेरा शाहजहाँ होता, मेरी रचना के लिए ताजमहल नहीं
प्रेस खुलवाता
३- शराबी - एक बहुत ही अजीब किस्म का प्राणी ! दीं दुनिया से कोई मतलब नहीं , घर, परिवार, देश सामाज से कुछ लेना देना नहीं । उसकी केवल अपनी दुनिया होती है । वह उसी में अपनी संसार में खोया रहता है । उसे केवल एक ही चीज प्यारी रहती है और वह शराब वह हमेशा यही सोचता है - gaya साल दे गया मुझे गम ही गम, नए साल में मुझे मिले बस रमही रम
४- अफसर- मॉफ कीजियेगा ! किसी व्यक्ति विशेष के लिए यह नहीं है यह है ही ऐसा जीवa ऊँचा वर्ग एक बहुत ही जिम्मेदार आदमी पूरा विभाग उसके आगे पीछे नाचता है पर आखिर है तो वही आदमी न ! सांसारिक सुविधा भोगी वर्ग , कमजोरियों का पुतला , आप से कुछ भी छुपा नहीं है वह जनता है की यह गलत है फिर भी करता है । शायद वह bhi सोचता हो - हे भगवान् ! करो ऐसे विभाग में तबादला जहाँ करने को मिले नित्य प्रति घोटाले दर घोटाला ।
५- जेब कतरा- यह मेरे हिसाब से सबसे विचित्र प्राणी है कभी न कभी आप का पाला इस जीव से अवश् पढ़ा होगा याद कीजिये । याद कीजिये कोई भीड़ वाली जघन जैसे बस स्टैंड , टैक्सी स्टैंड, बाज़ार सिनेमा हाल यहाँ तक की रेस्तरां गार्डन में यह लोग मिल जाते है । शायद कभी आप को मिला हो यह यू ही पहचान में नहीं आता बहुत आत्मीता से आप से मिलेगा , आप के बहुत करीब बैठा होगा सुख दुख की बाते की होंगी विदा लेते समय आप भावुक हो गए होंगे हो सकता है आप की आँखों की कोर भीक गयी ही बाद में पता चला हो की आप ने पैसा निकालना चाह और हाथ ghusta ही चला गया हो पर्स का पता ही नहीं चला हो आप नहीं समझ सके की आप जेब कट गयी। निश्चित ही जेबकतरा यह सोचता होगा - हे भगवान् !हो जाये चमत्कार ऐसा की , लोगों की जेब से निकल ए आप ही आप पैसा।
इन बातों को सुनकर मेरा कैमरा बोला यार फैज़ तो कुछ नही कहेगा । सुधा जी ने चुनावी माहौल के बारे में कुछ नही कहा है मैंने कहा अच्छा सुन मई नेता के बारे में बताता हूँ........
१-नेता-ये बेचारा सा लगने वाला आदमी आप को चुनाव के पहले कही किसी भी चौराहे पर जनता के बीच खड़ा दिखाई देगा । उसके लिए कीचड़ भरी गलियां भी फूलो से सजी दिखाई देते है ये भैस के झुंड की तरह उसे रौंदते हुए चलता है ये जानता है की जनता बेवकूफ है । ये हमेशा यही सोचता रहता है की ......... तुम हमें वोट दो हम ,हम तुम्हे चोट देंगे
२-जनता-ये तो निरा बेवकूफ सा लगने वाला आदमी है । जब चुनाव आता है तो आश्वासनों की शहद से इतना लपेटा जाता है की उसको अपने हित-अहित का ध्यान नही देता । अपने वोट का बिना सोचे समझे इस्तेमाल करता है फ़िर सिस्टम के खिलाफ एक दम से भड़क जाता है । जब दुबारा चुनाव आता है तो फ़िर वही कार्य करती है ये हमारी प्यारी जनता इनके लिए मेरा कहना है.......... ................................ इनका है बस यही गाना ,हर साल आए चुनाव । हमें मिले मलाई और शहद
तो फिर सोचिये क्योंकि वक्त बहुत कम है ........
सोच समझ के वोट करे ........
Wednesday, April 8, 2009
जूते का टेंपो हाई है ...........
Tuesday, April 7, 2009
कहा गए वो लोकलुभावन नारे
मेरा कैमरा अभी -अभी एक चुनावी सभा से लौटा था । मेरे पास आकर बोला फैज़ अब चुनाव की रिपोर्टिंग करने का मन नहीं करता मैंने पुछा क्यों तो कुछ देर रूक के बोला यार अब सारी चुनावी सभाएं नीरस होती है । कुछ मज़ा नहीं आता वह जाने के बाद सिर्फ नेता जी का भाषद सुनने को मिलता है। ..............मै उसकी बात सुन के बोला अच्छा तू उन पुरानी चुनावी सभाओं की बातयाद कर रहा है जहन गगनचुम्बी नारे लगाये जाते थे । ये नारे ही चुनावी समिकरद बदल देते थे । जिसने कई बार प्रत्याशियों को जिताया और हराया है । .............वो बोला हाँ यार अब तो सब नीरस हो गया है पर ऐसा क्यों मेरे समझ में नहीं आया ......मैंने कहा अरे पगले यही तो चुनाव आयोग का चुनावी डंडा है कोई भी कही भी सभा में अपनी प्रशंसा में नारे नहीं लगवा सकता । अगर ऐसा हुआ तो उसका पर्चा रद हो सकता है अगर किसे ने शिकायत की तो .....मेरा कैमरा बोला अच्छा किया फैज़ मुझे बता दिया वरना मै तो आज नारे लगा के आता .......
तो अब आप भी सचेत हो जाये क्योंकि वक़्त बहुत कम है ...........
कुर्सी की Aatmkatha
मेरे लिए लोकतंत्र का जनाजा उठाया जाता है , सविधान को ठेंगा दिखाया जाता है और क़ानून को नज़रबंद कर दिया जाता है । मेरे लिए दोनों 'ध्रुव' एक हो जाते है , दुश्मनों में सुलह हो जाती है " शेर और मेमना मिल जुल कर जंगल राज बनने के लिए प्रयास करते है ।
मै कुर्सी हूँ , यानी सत्ता, हक़, सहूलियत, ऐश्वर्ये ,ख्याति ,मेरे सामने बड़े बढूँ की बूलती बंद हो जाती है, ताकतवर लाचार हो जाता है ,जानकर बे जान हो जाता है ,मेरे लिए रतून रात इमां बदल जाते है ,बैनर बदल जाते है । मै हकीकत हूँ और सब बकवास । मै ही घोशादा पत्रों का सार और विपछ की तीस हूँ ,मुझे हासिल करते ही कंगाल मालामाल और मुर्ख अक्लमंद हो जाता है , मेरे छूने से अंधे देखने लगते है । गरीबे का नामोनिशान मिट जाता है । दौलत से घर भर जाता है । बैएमानी मेरी बुनियाद है , तिकदाम्बाजी मेरा ईमान है , ज़ुल्म मेरा औजार है,झूट मेरा कवच है , घदेयाली आंसू मेरे गहने है , भ्रष्टाचार मेरी औलाद है , फरेब मेरी शान है , सलीका मेरा दुश्मन है ।
लोकतंत्र में मैदान और लडाई के तरीके बदल गए है , अब मुझे नपने के लिए जनता किए सामने "न" निओभाने वाले वादे करने पड़ते है , भूख हड़ताल और पैदल यात्राओं की भीड़ खींचू नाटक भी करने पड़ते है , गुंदू की फौज रखनी पड़ती है ,और किराये पर "जिंदाबाद" कहने वालो की भीड़ रखनी पड़ती है ।,
मै कुर्सी हूँ, जो नुझे हासिल कर लेता है उसे और कुछ पाने की इच्छा नही रहती । एक बार जो मेरी पनाह में आ जाता है वह उमर भर मेरा ही हो कर रह जाता है । मेरे पास आँख और नाक नही है इसलिए मै दुनिया की चीख नही सुन सकता । भूख नागो के हालत नही देख सकती ।
मेरे पास कपटी दीमाग और मज़बूत पैर है मै इन दूनो अंगू का भरपूर इस्तेमाल करता हूँ , अपने दीमाग से राज्नीते की बीसात बेचता इ हूँ । वीरोधियूं के कूचाक्र्र को नाकाम करते हूँ और मज़बूत पैरों से आगे वालोए कुर्सी पे बैठेने वाले को रस में सरबूर कर देती हूँ।
साहित्य के ठेकेदारून ने नौ रासो में मुझे जगह न देकर मेरा अपमान किया है । शीरिंगार रस को रस राज कहा जाता है जबकि मेरे बिना वो भी बेकार है , इसलिए साहित्य के ठेकेदारून को चाहिए की एक नए रस का खुलासा कर दे .कुर्सी रस
saabhar
Dheerendre singh