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Thursday, August 6, 2009

"सर कटाने चला था वतन के लिए"

आज जब मै ऑफिस से घर पहुँचा तो मेरा कैमरा मुझसे कहने लगा फैज़ तुने अपना कुरता -पैजामा धुलवा कर प्रेस करवाया की नही ,मैंने पुछा क्यों तो वो बोला अरे पगले १५ अगस्त आ रही है । तुझे भी तो कही झंडा फहराने के लीये जाना होगा ......नही यार कल मेरी कालोनी वालों ने मुझे बुलाया था लकिन मैंने कहा की इस काम के असली हकदार हमारे कालोनी के शर्मा जी है जिनके बेटे ने इस देश की रक्छा करते हुए इस पर अपने प्राण लुटा दिए थे ,कारगिल के cमें .......वह फैज़ तू तो बड़ा समझदार निकला पर हमारे देश के नेताओं को क्या हुआ है जो झंडा फहराने के लिए इतने उतावले रहते है ,उन्हें देश के वो वीर सपूत और उनके परिवार वाले नही याद आते । क्या ? लालकिले की प्राचीर पर सिर्फ़ माननीय प्रधानमंत्री जी का ही हक है झंडा फहराने का , मै जनता हूँ मेरी इस बात से लोग कहेंगे की अरे प्रधान मंत्री ही तो तय करता है की क्या कब और कैसे होगा ताकि देश सही रूप से प्रगति के पथ पर आगे चल सके , लेकिन क्या कभी कोई प्रधानमंत्रीयुद्घ में मोर्चा सँभालने गया है या फिर उनके बच्चे याफिर कोई नेता ही ...नही न तो फिर ...............

अरे फैज़ इतना परेशान मत हो तेरी इस बात को सहमती देती हुई एक कविता किसी कवि ने पहले ही लिख दी है ,तुझे सुनाता हूँ ..............

सर कटाने चला था वतन के लिए ,कत्ल होने से पहले ही आ गया होश में ।

कोसने फिर लगा दिल को नादान है तू , पगले ये था क्या करने चला जोश में ।

मांग बीबी की सूनी पड़ जायेगी , कोख माँ की लालन से उजड़ जायेगी ।

बाजू भाई के कमज़ोर पड़ जायेंगे , साँस सरहद पे तेरी उखड जायेगी ।

पूछता हूँ तुम्ही से बता तू ऐ दिल, चाँद वर्षों पहले हुआ था कारगिल ।

राखी के दिन बहन को रुलाई मिली , .......................

जाकर पूछो ज़रा तुम शमशानों से , दश पर मर मिटे उन दीवानों से ।

तनहा उनपर थी दस-दस की जब टोलियाँ , कौन नेता गया था बचने वहां ।

शान जबकि तिरंगे की वीरों से है , कायम चमक बलिदानी हीरों से है ।

जान सरहद पर नेता गवाते नही , लाल भी इनके लड़ने को जाते नही ।

फिर तिरंगा ये नेता फहराते है क्यों , क्यों वतन के सीपाही फहराते नही .........................

Thursday, July 30, 2009

जंगल का राजा कौन "आदमी या शेर"

उफ्फ्फ कैसा डरावना मंज़र रहा होगा वो जब वो लोग शेर का शिकार किया हुआ मांस उसके मुँह से छीन ले गए । ये सब बातें मेरा कैमरा मुझसे बता रहा था । उसने मुझसे पूछ लिया की आख़िर ये मनुष्य कितना बड़ा जानवर है की वो जंगल के राजा शेर का भी भोजन छीन ले रहा है । अब आप कहेंगे की मेरे कैमरे का दिमाग ख़राब हो गया है ,लेकिन ये सच है । बी.बी.सीकी ताज़ा जारी रिपोर्ट के अनुसार भूख से बेहाल कैमरून के गांवों में रहने वाले लोग इन दिनों जंगल के राजा के घर में सेंध लगाने से भी नहीं घबरा रहे ।.........


शेर ने शिकार मारा और उससे निकलते गर्म ख़ून पर ज़ुबान फिराना शुरू ही किया कि गांववाले पहुंचे, किसी तरकीब से उसे वहां से भगाया और मांस लेकर रफ़ूचक्कर । अंग्रेज़ी में इसे क्लेप्टोपैरासाइटिज़्म कहते हैं, जिसमें जंगल के बड़े शिकारी यानि शेर, लकड़बग्घा, चीता एक दूसरे का मारा हुआ शिकार चुरा लेते हैं । लेकिन अफ़्रीका के जंगलों में काम कर रहे पर्यावरणविदों का कहना है कि अब इंसान भी इस चोरी में शामिल हो गए हैं और ये धड़ल्ले से हो रहा है । chinta की बात ये है कि धीरे धीरे ये आदत फैलती जा रही है और कैमरून में घटते हुए शेरों की संख्या के लिए ये ख़तरे की बात है ।


यही नही शेर से उसका शिकार चुराते हुए स्थानीय गांववालों की रिपोर्ट अफ़्रीकन जरनल ऑफ़ इकोलॉजी में भी प्रकाशित हुई है । इसमे एक शेर और शेरनी पर कुछ समय से नज़र रख रहे वैज्ञानिकों ने पाया कि उन्होंने कुछ ही देर पहले एक बड़े से हिरण का शिकार किया था और उसे खा रहे थे जब उन्हें वैज्ञानिकों के वहां होने का एहसास हुआ । शेर और शेरनी दोनों ही पलक झपकते ही झाड़ियों में छिप गए । वैज्ञानिक वहां से हट गए लेकिन कुछ घंटों बाद जब लौटे तो देखा कि वहां कुछ स्थानीय गांववाले जुटे हुए थे और बाहरवालों को देखकर वो भी छिप गए । वैज्ञानिकों ने पास जाकर देखा तो पता चला कि गांववालों ने चाकू से सारा मांस निकाल लिया था, वहीं से पत्ते लेकर उसे पैक भी कर लिया था और बिचारे जंगल के राजा और रानी के लिए छोड़ा था बस सर, खुर और बची खुची अंतड़ियां । उन्हें दूसरा ऐसा ही नज़ारा दिखा कैमरून के वाज़ा राष्ट्रीय पार्क के अंदर जहां शेर को भगाकर उसके मारे हुए हिरण पर क़ब्ज़ा कर लिया गया ।वैज्ञानिकों का कहना है कि बोरोरो जनजाति के लोग अक्सर ये करते हैं और आमतौर पर शेरों को भगाने के लिए लाठियों और आग का सहारा लिया जाता है ।


शोधकर्ताओं का कहना है कि इसका शेरों की संख्या पर गंभीर असर हो सकता है क्योंकि एक शिकार को मारने में शेरों को ख़ासी मेहनत करनी होती है और उसके बाद भी अगर उन्हें भूखा रहना पड़े तो ज़ाहिर है उनकी ताक़त कम होगी । पिछले कुछ सालों के सर्वेक्षणों में इन जंगलों में शेरों की संख्या घटती नज़र आ रही है और एक अनुमान है कि यहां हर साल छह शेर ग़ैरक़ानूनी तौर पर शिकार किए जाते हैं,और अगर उनका निवाला भी उनके मुंह से छिन रहा है तो फिर भगवान ही बचाए जंगल के सम्राट को ..................!!!!!!!

Monday, July 27, 2009

"जय हो"


कल मै बहुत आहत था , मैंने ये कभी नही सोचा था की हमारे देश में हमारे शहीदों के साथ ये होगा । आप सोचेंगे आख़िर हुआ क्या तो सुनिए ॥कल मै जब सुबह टी। वी देख रहा था तभी मेरे घर के बगल के एक बच्ची ने मुझसे एक सवाल पूछा की अंकल ये कारगिल क्या है सुबह से दिखा रहे है टी.वी पर .........तभी से मै अपने आप को कोस रहा हूँ की क्या होगया है हमारे देश के रखवालों को , कैसी हो गई है हमारी शिछा की हम १० साल पुरानी घटना को अपनी आने वाली पीढी की दिमाग में नही डाल पा रहे है । ...समाज के वो लोग कहाँ मर रहे जो समाज उत्थान का बीडा उठाये हुए है । इनको भी आज का दिन भी बस एक पार्टी सम्मेलन की तरह दिखाई देता है बस लंबा लेक्चर दिया , और वही रता रटाया शेर पढ़ दिया की ....शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले ,वतन पर मरने वालों का यही बाकी निशा होगा । लेकिन उन्हूने सोच है की कल को आने वाली पीढी को क्या बताएँगे .....,..क्यों आज तक किसी कारगिल शहीद की वीरगाथा किसी माद्यमिक बोर्ड की किताब में नही छापी क्या इसके पीछे हमारा सिस्टम दोषी नही है । .......क्यों फिर ये कहा जाता है की शहीदों के परिजन बेवजह हो-हल्ला मचाते है । जब आप उनके उस बेटे को सिर्फ़ एक दिन याद करेंगे जिसने आप की जिंदगी के कितने साल बचाए तो उनका मन आहत नही होगा । ....सभी राज्य सरकारों को चाहिए की वो अपने यहाँ क्लास १ से अपने राज्य के अभी तक के सभी शहीदों की वीरगाथा उनकी जीवनी के साथ छापे और चलाये । तब जाकर उन शहीदों को सही श्राधांजलि मिलेगी ।


क्या हम भी उनके लिए कुछ कर सकते है ? यदि हाँ तो आइये आज एक संकल्प करते है की हम उन देश के जवानो की वीरता के किस्से इस तरह से आम करेंगे की बच्चा बच्चा उनकी वीरता का गुडगान करेगा .............

Sunday, July 19, 2009

"पढ़-पढ़कर बालक हुए लछ्य हीन बदहाल, है व्यवसाय न नौकरी ,जीवन है जंजाल"


कल मेरा कैमरा अस्पताल से लौट आया मैंने उसे एक पत्रिका दी ताकि वो बोर न हो ,थोडी ही व्यापार बाद वो मेरे पास आया और मुझे कुछ पढ़ कर सुनाया । वही मै आप को पढ़ना चाहता हूँ । शायद आप को सतीश वर्मा जी का यहाँ रोचक लेख पसंद आएगा ................

जीवन में अब रस नही ,नीरस है परिवार, माता-पिता सर्विस करें , शिशूग्रह है व्यपार ।

स्नेह कहाँ ममता कहाँ 'कीटी-पार्टी' बीच ,बच्चे आया पालती जो धन रही उलीच ।

अठमासे शिशु को नही मम्मी पास सुलाए ,बिगडे फिगर न दूध भी डिब्बा बंद पिलाये ।

माता अब मम्मी बनी पिता बन गए अब डैड , एक बरस का शिशु रहे सोता सिंगल बैड ।

इकसठ में था लव हुआ बासठ हुआ तलाक़ , हुए रास्ते अलग अलग तो बच्चा हुआ तलाक ।

शिछा बिकती है यहअन गली मुहल्ले गाँव , शिशु के पुस्तक भार से सीधे पड़े न पाँव ।

विद्यालय ये है नही क्रूर विद्यालय मात्र ,दुर्वट पुस्तक भार को सहते कोमल गात्र ।

शिछालय तो बन गया हितकारी व्यापार , अल्प्वित शिछ्क सुलभ शिशु की मारामार ।

अब नही रहे वो गुरु -गुरु रहे शिश्यधन छीन , कैसे विद्या पाएंगे श्रधा हिन् मलीन ।

बीस दुधमुहे चल दिए चढ़ के शिछा माहि , भारी बसता लादकर सब विद्यालय जाहि ।

मिले चार सो पे जिसे वह मिस्ट्रेस कहलाये , मैनेजर की नौकरी जो हर शाम बजाये ।

ड्रेस-बेल्ट,कापी-कलम, बिल्ला-बूट-किताब ,विद्यालय से ही मिले पुरा रखे हिसाब ।

पढ़-पढ़कर बालक हुए लछ्य हीन बदहाल, है व्यवसाय न नौकरी ,जीवन है जंजाल ।

उलटा और डरावना पढ़ा रहे इतीहास ,जैसे मुर्दा देश यह पीटने का अभ्यास ।

भवन-तात्पति नही , शिछ्क खडिया नही, बालाहार बाज़ार में ,टीचर निज ग्रह माही ।

चुराहे पर देश है लुटा पित्ता बदहाल , पग-पग मदिराल्ये खुले ,जनता हुई निहाल ।

और अंत में एक लाइन मेरी भी जोड़ लीजिये की.........

नित्य सिकुड़ता जा रहा भारत का भूगोल , तनिक न चिंता देश की नेता गोल-मटोल ।


Sunday, July 5, 2009

"मुर्दा कब्र के बाहर आया"

सभी कहते है की भारत देश का क़ानून सबसे अच्छा है । लेकिन मैकहता हूँ की यहाँ का कानून सबसे ख़राब है । आप सोच रेहे होंगे मैंने ऐसा क्यों कहा तो सुनिए .........ये वही क़ानून है न जिसे कभी पूजा जाता था कहा जाता है की या सभी नागरिकों को सामान रूप से जीने का हक देता है लकिन अब तो कोर्ट-कचहरियाँ गडे मुर्दे भी उखाड़ने से गुरेज़ नही करती । ऐसे आदेशों की बयार सी आगई है जिनमे लाश को कब्र से बहर निकल कर उनका दुबारा पोस्टमार्टम किया गया । आख़िर क्या वजह है की डॉक्टर सही से पोस्टमार्टम रीपोर्ट नही बनते और फ़ैसला सुननाने में दिकतें आती है । ...........


आप ही बताये यदि कोई हिन्दू लड़की या व्यक्ति मारा जाता jammu में तो आज हाईकोर्ट उसका दुबारा पोस्टमार्टम कराने का आदेश कैसे देती । क्यों नही ऐसे डॉक्टरों को दंड मिलता जो ग़लत या भ्रामक रीपोर्ट बनते है। कभी आप ने सोचा है की क्या बीतती है उनके परिजनों पर जब उनकी लाश दुबारा कब्र से बाहर निकाली जाती है। ....अभी हाल ही में हमारे बनारस में भीएक दहेज़ प्रताडित महिला का शव कब्र से बाहर निकला गया जिसको लेकर कई दिनों तक चर्चो का बाज़ार गर्म रहा फिर सभी खामोश हो गए । आख़िर कब तक खामोश रहेगा हमारा समाज । क्या समाज के ठेके दार आज भी अपने हित के लिए खामोश रहेंगे ? क्या हाईकोर्ट इस पर भी कोई प्रावधान बनाएगी या फिर ऐसे ही लोगों की भावनाओं को चोट पहुचती रहेगी । क्या उसे सिर्फ़ समलैंगिक लोगों के हित का ध्यान आया है या फ़िर समाज की इस घटना पर भी कोई क़ानून बनने का ख्याल आया है । उसे चाहिए की कोई ऐसा क़ानून बनाये की आतंरिक परीछाद रिपोर्ट में जो बातें हो वो एक बार में सही लिखी गई हो नाकि ग़लत , ताकि किसी भी महिला या पुरूष को मरने के बाद न सताया जाए। ..........

आप ही बताये क्या मे ग़लत कह रहा हूँ क्या किसी धर्म में ऐसा लिखा गया है की मरने के बाद व्यक्ति को यातनाए दी जाए वो भी बार बार । सोचिये और मुझे बताइए मे इंतज़ार कर रहा हूँ उन माँ-बाप की तरफ़ से जिन की बेटियों और लड़कों के साथ ऐसा हुआ ..............

Thursday, July 2, 2009

"समलैंगिक फ़ैसला"

आज मेरा कैमरा अस्पताल में भरती है ,कल रात से उसकी तबियत ख़राब है । मुझसे डॉक्टर ने पुछा की क्या हुआ है इसे तो मै बता भी नही पाया । पर आप से बताना चाहता हूँ .............

कल जब सुप्रीम कोर्ट का समलैंगिक फ़ैसला आया तभी से ये बहकी बहकी बातें कर रहा था । आखिर रात होते होते इसे तेज़ बुखार चढ़ गया । ये नींद में बडबडा रहा था की मुझे भी एक मेरी तरह का कैमरा लाके दो । मै बहुत परेशान हो गया और उसे यहाँ ले आया ।

खैर ये तो मेरा कैमरा था लकिन आप क्या कहते है इस समलैंगिक सरकार के इस समलैंगिक फैसले के बारे में । क्या प्रकृति के नियमो के विरूद्व जाना सही है । क्या संस्कृति प्रधान देश में ये सब करना उचित है । जिस तरीके से हाईकोर्ट ने समलैंगिक सबंधों को अपराध करार देने वाले १४९ वर्ष पुराने कानूनों को बुनियादी अधिकारों का उलंघन बताया है, क्या वो सही है। हाईकोर्ट की न्यायाधीश ऐ.पी.शाह और एस .मुरलीधर की पीठ ने कहा की १४९ वर्ष पुर्व जारी क़ानून ३७७ सविधान की धारा १४,१५,१९ वा २१ का उलंघन करती है जिसमे मानवाधिकार की बात की गई है । ..........

angrezon ने जो १४९ वर्ष पहले क़ानून बनाया था शायद वो सही था , सन १९४१ में उर्दू लेखिका इस्मत चुग़ताई को अपनी कहानी "लिहाफ"के लिए सज़ा भुगतनी पड़ी थी जो इसी समलैंगिक रिश्तों पर आधारित थी । क्या कभी किसी ने ये सुना है की किसी जानवर ने भी ऐसा किया है ...जब हमारे इस पवत्र संस्कृति वाले देश में जानवर भी इसे पाप समझते है तो फिर हम आप कौन होते है प्रक्रति के नियमो से छेड़ छाड़ करने वाले । कुछ लोगों ने खजुराहो की मूर्तियों की बात कही है की जो समलैंगिकता का विरूद्व करते है उन्हें खजुराहो की मूर्तियों देखनी चाहिये । उनसे कोई ये पूछे की तब गुरू को भगवान् का दर्जा मिलता था अब क्यों नही मिलता , तब नारी देवी सामान थी अब क्यों नही , तब लोग रजा और राज्य के प्रति समर्पित थे अब क्यों नही , तब राजा प्रजा का बराबर से दयां रखता था कोई उसके लिए अलग नही था । तो सिर्फ़ इसी बात के लिए क्यों याद आई खजुराहो की मूर्तियाँ ।

वही कुछ समय पहले जिस सरकार ने इस फैसले पर असहमति दिखाई थी वही इसके साथ खड़ी दिखी , तब उसने कहा था की इससे ऐड्स के के मरीजों में वृद्धि होगी ,साथ ही उसने जाम्बिया का आकडा भी रखा था जहा ३३ प्रतिशत समलैंगिक ऐड्स का शिकार है । ऐड्स संघ ने कहा है की भारत में समलैंगिकता पर से कानूनी रोक हट जाने से सबसे अधिक फायदा ऐड्स के छेत्र में होगा लोग अब इस पर खुल के बात करेंगे । अब उनसे कौन कहे की हमारे यहं परिवार नियोजन की इतनी बड़ी समस्या है उस पर तो कोई खुल के बात नही करता तो इस पर क्या करेंगे । चाहे जो हो मै तो यही कहूँगा की हमें कोई हक नही है हम प्रकृति के नियमों के साथ खिलवाड़ करे । चलिए डाक्टर साहब आरहे है मै अपने कैमरे की तबियत पूछ लूँ और आप इस विषय पर चिंतन कीजिए और मुझे बताइए ....................

Wednesday, June 24, 2009

"बोरवेल अंकल का साछात्कार"

कल एक और बच्ची "बोरवेल अंकल" के मुँह में जा गिरी । फ़िर क्या था हाँथ पाँव फूल गए प्रशासन के सभी भाग दौड़ करने लगे । एक बार फ़िर खबरिया चैनलों को २४ घंटे दर्शकों को बांधने का मौका मिल गया। मेरा कैमरा भी निकल गया इस घटना क्रम को करीब से देखने ,और जब वो लौटा तो उसके पास ऐसा कुछ था जो शायद ही किसी मीडिया के रिपोर्टर के पास हो । वो था उस बोरवेल और उसमे गिरे तमाम लोगों का साछात्कर ............जिसे मै आज यहाँ पेश कर रहा हूँ । आशा है आप को पसंद आएगा.........



पहला प्रश्न बोरवेल अंकल आप से .....ये बताइए की आप का जन्म कैसे होता है ? उत्तर -अजी होना कैसे है बस सरकार से ठेका होता है और ठेकेदार लोग हमें बड़ी बड़ी मशीनों के द्वारा खुदवाते है । जिससे उस जगह पर पानी की कमी पुरी की जा सके । बस इस तरह हमारा जनम होता है ।



प्रश्न-२- ये बताइए आप की प्रविती खुले रहने की हमेशा खुले रहने की है या बस युही मज़ा लेने के लिए ? उत्तर - देखिये मेरा मुँह न खोल्वाइये । हम कोई शौक नही रोज़-रोज़ बच्चों को गोद लेने का जो मुँह खोल के बैठे रहे की प्रिंस आए ,ज्योति आए या फ़िर अंजू । वो तो ठेकेदारों और सरकार की मिली भगत होती है ।जितने पैसे सरकार बोरवेल खुदवाने के देती है उतने ही उसे पाटने के भी ,लकिन ये लोग पैसे खा जाते है । जब कोई हमारे अन्दर गिर जाता है तो फिर सरकार उसे पाटने का आदेश देती है फिर से टेंडर होता है फिर से पैसे की दलाली होती है ।



आइये अब बात करते है भारत के बोरवेल में गिरे सबसे पहले बच्चे प्रिन्स की जिसे देश ही नही पूरी दुनिया ने ५४ घंटे तक लगातार देखा । उस दिन तारीख थी , वो मार्च की २१ तारीख थी जब एक तरफ़ मिलेट्री उसे बहार निकलने के लिए जी - जान लगाये थी वही भारत का एक अमूल्य संगीत रत्न गहरी नीद में सो चुका था जी हाँ भारत रत्न उस्ताद बिस्मिल्ला खा .......जिन्हें ३९ जी.टी.सी। गोरखा रेजिमेंट के जवानों ने राष्ट्रिय सम्मान के साथ सुपुर्दे खाक किया ।



प्रश्न-३-तो प्रिन्स जी ये बताइए उस दिन क्या हुआ था जब आप बोरवेल में गिरे थे ?
उत्तर- मै तब बहुत छोटा था मुझे कुछ याद नही लकिन बाबा बताते है की मै खेलता खेलता वहां पहुच था और फ़िर जो हुआ उसे पुरी दुनिया ने देखा । क्या हुआ कैसे बचा और बाकी सब । हाँ मै ये कह सकता हूँ की मेरे गिरने के बाद बोरवेल में गिरने का ट्रेड सा आगया है ।


प्रश्न-४-अगला प्रश्न अंजू जी आप से ये बताइए कैसा लग रहा है आप को बोरवेल की घटना के बाद ?


उत्तर - जी सब भगवान की मर्ज़ी है ,वरना मै तो अपने आप को मारा समझी । बोरवेल अंकल ने मुझे तो फसा दिया था ....मै कुछ समझा नही ...सब न्यूज़ वाले यही कह कह कर सब बात उगलवा लेते है । क्या आप लोग बिना समझ के यहाँ तक पहुचते है । .........बात ये हुई की मै सुबह में खेल रही थी की मुझे बोरवेल अंकल की आवाज़ सुनाई दी ,मै वहां गई तो वो बोले की मुझे तो कोई आज कल पूछ नहीं रहा ऐसा है तो शाम में मेरे पास आकर खेलना और इसमे गिर जाना तुझे मै ज़्यादा अन्दर नही जाने दूँगा । तू मरे गी नही....मै भी मशहूर हो जाऊँगा और तुम भी .........

देखिये अंजू जी मेरे ऊपर आप इल्जाम लगा रही है , आप ही ने तो पैसा पाने के लिए ये सब किया था । आपके पिताजी ने मुझे मुँह ना खोलने के लिए कहा है वरना ....दिखिये बोरवेल अंकल आप मेरे पिताजी पर झूठा आरोप लगा रहे है । मेरे पिताजी तो बहुत गरीब है , आप झूट बोल रही है ...नही आप झूट बोल रहे है .........

यही ख़त्म होता है ये अनोखा साछात्कार हमें अपनी राय अवश्य भेजे ............


Friday, June 12, 2009

"जनहित में जारी -महिला सशक्तिकरणके नुक्सान "

आज मेरा कैमरा मुझे कुछ जानकारी दे रहा था । वो महिला सशक्तिकरणके नुक्सान के बारे में बता रहा था । उसने मुझे बताते हुए कहा .....जनता है फैज़ ..... जब से राष्ट्रपति सर्वोच्च पद पर महिला विराजित हुई थी, तभी से आपराधिक राजनीति के जनक पुरुषों की नींद हराम हो गई थी,और अब तो संसद की स्पीकर भी महिला हो गई है । इधर पत्नी पीडित संघ ने भी इस बात पर खेद प्रकट किया था की ,पुरुषों के लिए एकाध पति का पद तो छोड़ देते ? पंचायतों ,नगरपालिकाओं में ३३%महिलाऐं बिठा रखी थी वो क्या कम थी जो संसद में भी उन्हें आराछ्द चाहिए,वो क्या कम है ? ......पतियों का यह बेहद अपमान है, वो भी पति प्रधान देश में । यहाँ महिलाएं कभी इश्वर के पद पर बैठी है ? भगवान् राम हो या एनी कोई सभी तो पति ही थे । पत्नीयां सदेव इनके चरण दबाते देखि गई है । चाहे वो महा लक्ष्मी हो या सीता । धर्म ध्वजा धारदकरने वाले साधू संत भी इन महिलाओं से प्रसन्न नही है । कल वो उनका आश्रम चलाने लगेंगी तो धर्म का पालन कैसे होगा । अतः यह फ़ैसला तो धर्म संगत हरगिज़ नही होगा ।
यदि सांसद,विधायक,मंत्री पदों पर भी पत्नियाँ बैठ गई ,तो पति क्या झाडू लगायेंगे और रोटी बेलने का कार्य करने लगेंगे । इधर राजनीती में आपराधिक गतिविधियाँ इतनी बढ़ गई है की महिलाए वहां टिक नही सकेंगी । कबूतरबाजी ,फिरौती, घूसखोरी,डकैती,बलात्कार जैसे अपराधो को कौन करेगा ? यदि ये सब अपराध बंद हो गए तो चुनाव में धन कहाँ से आएगा । चैनलों पे स्टिंग आपरेशन नही होगा तो उसे कौन देखेगा । एकाध डकैत फूलन देवी या गाद मदर को छोड़ दे तो महिलाए चुनाव लड़ने के लिए धन कहा से लायेंगी ?चुनावी फंड एकत्रीत करने के लिए खाली पुरुष ही सक्षम होता है । क्या पत्नियाँ गुजरात के सांसद बाबू भाई की तरह दुसरे के पतियों की कबूतरबाजी कर सकती है ? भारतीय पत्नियाँ तो जन्म-जन्मान्तर के लिए एक ही पति चुनने के लिए संकट सोमवार का व्रत रखती है ,और जीवन भर अपने पति की पूजा करती है । चाहे वो कितनी भी पत्नियाँ रखे । वह मारे पीते तब भी वह परमेश्वर है । क्या वो फिरौतीa का धंधा करवा सकती है ? या दुसरे के बच्चो को अगवा करवा सकती है या अगवा करवा कर उनका गला घोट सकती है ? नही .....
३३%महिलाएं यदि पार्षद ,विधायक,सांसद बन गई, तो वो थानेदारों के डंडो से पुरूषों को बचा भी नही सकती । कोई महिला नेत्री किसी अपराधी को छुड़वाने के लिए पुलिस के साथ मारपीट भी नही कर सकती तो लोग उन्हें वोट क्या देंगे । इधर पंचायतो में में जो महिलाये पञ्च, सरपंच बनकर बैठ गई है तो भी कुछ बदला नही है । आज भी वो घूंघट में में रहकर पंचायतो का काम चलती है । अपने पतियों के आदेश पर निर्दय लेकर काम करती है । वास्तव में महिलाये सशक्त नही हुई है और न कभी होंगी । आज भी वो छिनालों की तुलसियों की तरह सास-बहो छाप सीरियल देखकर घंटो सिसकती रहती है । सप्ताह में ४-५ बार उपवास रखती है । भले ही उनके पति दिन -रात दारो पीकर खात तोड़ते रहे । संसद या विधानसभा में जाकर तो वो इन्हे निर्जीव ही बना देंगी । जब वहां गालियाँ नही बाकि जाएँगी , कुर्सियां नही जाएँगी तो क्या मज़ा आएगा ? फ़िर तो संसद और विधानसभाओं में किसी प्रवचनकार साधू का मंडप ही नज़र आने लगेंगे ।


चदक्य ने भी अपने अर्थशास्त्र में लिखा है की महिलाऐं ही महिलाओं की शत्रु होती है । उनका काम राज्य करना नहीं होता अपितु विष कन्या बनकर शत्रु राजाओं का भेद लेना होता है । इससे अधिक वो कुछ भी नही कर सकती । कम से कम राज्य तो नही चला सकती है और नही राज्य के सभापतियों को संचालित कर सकती है । इसी वजह से भारत के सर्वोच्च पद पर महिला के चुने जाने पर महिला नेत्रियों ने ही जमकर विरूद्व किया था किन्तो इस बार कोई दिखा नही जो की अपवाद है । सोनिया गाँधी को प्रधानमंत्री नही बनने देने के लिए सर्वाधिक विरोध उमा भरती तथा सुषमा स्वराज ने किया था । पति पीडित संघ ने महिलाओं को उच् पद पर आसीन करने का घोर विरोध किया है । कथित स्त्री स्वातंत्र्य आन्दोलन के नाम पर, घर भर का बोझ उन्हें पहले ही उठाना पड़ रहा है । पत्नियों के सामजिक कार्यक्रमों भाग लेने की वजह से उन्हें खाना बनाना तथा बर्तन मांजने का काम पुर्व से ही करना पड़ रहा है । इधर नौकरी में अपने बोस की घुड़कियाँ खाना तो रोज़मर्रा का काम है ही । पहले राष्ट्रपति और अब लोकसभा स्पीकर के पद पर एक महिला के आरूढ़ होने के बाद ,उन्हें क्या -क्या कष्ट भोगना पड़ेगा । यह तो भगवान ही जानता है .................


मैंने अपने कैमरे से बरबस ही पूछ लिया ,यार ये बता तेरे दिमाग में ये बात आई कहाँ से । वो बोला घबराता क्यों है तेरी शादी तो अभी नही हुई है । तो जा ऐश कर ये सोचना जनहित में उनके लिए जारी है जो शादी-शुदा है । चलिए ये तो हुई मेरे कैमरे की बात ,आप बताइए मेरा कैमरा क्या सच कह रहा है ........................

Saturday, May 30, 2009

"ये माँ क्या होती है"



माँ................... ये लफ्ज़ सुनते ही मन में मिसरी सी घुल जाती है । आज मेरा कैमरा मुझसे ये जानना चाहता है की ये माँ क्या होती है ....वो मुझसे बोला फैज़ तो माँ को इतना क्यों मानता है ,आख़िर माँ है क्या चीज़ । मैंने उससे कहा सुन माँ क्या है ,दुनिया में रहने वाले सभी लोग क्या कहते है माँ के बारे में .............


किसी ने पूछा माँ क्या है ? कौन है ?.......................................


समंदर ने कहा -माँ एक ऐसी हस्ती है ,जो औलाद के सरे गम अपने सीने में छुपा लेती है !


बादल ने कहा-माँ एक कली है , जिसमे हर रंग साफ़ तौर पर नुमाया है !


माली ने कहा- माँ बाग़ का वह खूबसूरत फूल है , जिसमे पुरे बाग़ की खूबसूरती और महक है !


शायर ने कहा- माँ एक ऐसी ग़ज़ल है ,जो हर सुनने वाले के दिल में उतर जाती है !


औलाद ने कहा- माँ ममता की वो दास्ताँ है , जो औलाद के हजारों गम और हर दिल पर कुर्बान हो जाती है !


जज ने कहा- माँ एक ऐसी हस्ती है , जिसकी तारीफ़ के लिए दुनिया में अल्फाज़ नही मिलते !


फरिश्तो ने कहा - माँ वह शख्सियत है , जो औलाद की खुशहाली के लिए हमेशा दुआ करती है !


स्वर्ग ने कहा - माँ वो हस्ती है जिसके कदमो के निचे मेरी रिह्यिश है !


ईश्वर ने कहा - माँ मेरी तरफ़ से कीमती और नायब तोहफा है दुनिया वालों के लिए !


दुनिया कहती है - मुझे माँ और फूलों में कोई फर्क नही नज़र आता !


लकिन मैंने कहा - माँ नूर है ,महक है , फूल है , रंग है , प्रार्थना है , मोहबत है , ममता है , तोहफा है ,जज्बा है और माँ ममता है !...................................


अब मेरा कैमरा मेरे पास बैठा था वो जारो-क़तर रो रहा था और मुझसे पूछ रहा था...फैज़ मेरे पास माँ क्यो नही है । ये तो हुई मेरे कैमरे की बात ,लकिन आज कितने ही लोग है जो अपनी माँ को कुछ नही समझते ,भेज देते है उन्हें वृधा आश्रम में मरने जीने के लिए ,क्या उन्हें नही पता की माँ क्या होती है । अब आप बताइये की आपकी नज़र में माँ का क्या दर्जा है ........

Thursday, May 28, 2009

"मज़बूत होता महिला वर्ग"

आज मै काफी दिन के बाद कंप्यूटर पर काम कर रहा था की मेरा कैमरा मुझसे आकर बोला ,फैज़ कहा था तो दिखाई नही दे रहा था ,क्या कही गया हुआ था ....नही यार मेरे एक्साम चल रहे थे । अच्छा बता क्या बात है । कुछ नही तेरे छेत्र से जोड़ी एक ख़बर थी ,जनता है आंध्र प्रदेश में हैदराबाद से १०० किलोमीटर दूर पास्ता पुर गाँव में महिलाओं ने एक कम्युनिटी रेडियो की शुरूआत की है ।


अच्छा तू मुझे विस्तार से बता ,ले सुन............... आंध्र प्रदेश की राजधानी हैदराबाद से 100 किलोमीटर दूर पस्तापुर गाँव में स्थानीय कम्यूनिटी रेडियो ग़रीब महिलाओं के लिए खेतीबाड़ी की सूचना देने के साथ-साथ उनकी एक आवाज़ बन कर उभरा है ।डेक्कन डेवलपमेंट सोसायटी (डीडीएस) से जुड़ी एक कार्यकर्ता टी मंजुला लोगों के घर जाकर पैदावार के बारे में पूछताछ करती है और खाद्य वितरण करती हैं. ये उनके नियमित काम का हिस्सा तो है मगर वह अपनी रेडियो पत्रकार की भूमिका को लेकर काफ़ी उत्साहित हैं. पस्तापुर के एक साधारण घर में बने स्टूडियो से हर दिन दो घंटे प्रसारित होने वाले रेडियो कार्यक्रम में खेतीबाड़ी, स्वास्थ्य और संगीत के बारे में छोटी-बड़ी जानकारी दी जाती है. गाँव में ज्यादातर ग़रीब दलित महिलाएँ हैं. टी मंजुला भी भारतीय समाज के हाशिए पर रहने वाली एक जाति से ताल्लुक रखती हैं. वह कहती हैं, "स्थानीय स्तर पर मौजूद ज्ञान के भंडार को इकट्ठा करना हमारे लिए सुखद अनुभव है । यदि ऐसा नहीं करते तो ये अनुभव परिवारों में ही सिमट कर रह जाते । " मंजुला का कहना है, "कई लोगों को इससे फ़ायदा हुआ है और मैं हर दिन कुछ नया सीख रही हूँ ।"कम्यूनिटी रेडियो गाँव में इस कदर चर्चित हुआ है कि गाँव की कई महिलाएँ रेडियो कार्यक्रम में अपना योगदान दे रही है । क्यों है न कमाल की बात फैज़ सिमित संसाधनों में इतना सब कुछ ,वाकई कबीले तारीफ है । इतना ही नही ये जानकारी के साथ आमदनी भी करती है ...........खेतीबाड़ी के काम के अलावा एच लक्ष्मम्मा कम्यूनिटी रेडियो के लिए हर महीने क़रीब 10 घंटे का कार्यक्रम तैयार करती है । वह कहती हैं कि इससे उन्हें क़रीब 450 रुपए हर महीने मिलते हैं जिससे वह अपने घर वालों के लिए खाद्य सामग्री ख़रीदती हैं । लक्ष्मम्मा के पति ने कई वर्ष पहले उन्हें छोड़ दिया था। वह अपनी एक बच्ची का लालन-पालन ख़ुद करती हैं साथ ही वह डीडीएस की प्रमुख सदस्य भी बन गई हैं । गाँव में महिलाओं का जीवन कठिन है । औपचारिक शिक्षा के अभाव में वे पास के खेत में मज़दूरी करती हैं । गाँव में कम्यूनिटी रेडियो के आने से पहले उन्हें खेतीबाड़ी के क्षेत्र में इस्तेमाल किए जाने वाली नई तकनीकी, कैसे अपने फसल को बेहतर दामों में बेचा जाए इसकी बहुत कम जानकारी रहती थी । वे आस-पड़ोस को लोगों से बात कर या खेत में साथ काम करने वाले मज़दूरों से ही जानकारी जुटाती थीं । कम्यूनिटी रेडियो के माध्यम से अब वे ज्यादा से ज्यादा जानकारी पा रही है ।
तो अब तुम्ही बताओ फैज़ कौन कहता ही की महिलाये कमज़ोर है । कौन कहता है की ये अबला है .......
मेरा कैमरा शायद सच कह रहा है ,आप ही बताइए क्या सरकार को इनको आराछाद देना चाहिए ....या नही ,क्योंकि हो सकता है कल को ये कमुनिटी रेडियो भारत को विश्व पटल पर अंकित करने में महती भूमिका निभाए । तो सोचिये और बताइए........