INDIA Blogger

Saturday, December 5, 2009

"भारतीय एकता के सत्रह साल"

मेरा कैमरा आज मुझसे पूछ रहा था यार फैज़ आज ६ दिसम्बर है ना ,मैंने कहा हाँ आज कोई काला दिवस मनायेगा कोई शोर्य दिवस मनायेगा । तुम ठीक कहते हो फैज़ पर क्या किसी ने इस ध्यान दिया है की इन सत्रह सालों में हमारी एकता और अखंडता कहाँ तक पहुँची है.............
जी हाँ मेरा कैमरा सच कह रहा है क्या किसी ने इन सत्रह सालों में सोचा है की इससे हमारे देश की एकता और अखंडता को कितना नुक्सान पहुंचा है । सभी लोग चाहे वो समाज के ठेकेदार हो या फ़िर उज्वल वस्त्र धारद किए राजनेता जो सिर्फ़ इस दिन भाषद या फ़िर शोक सभा का आयोजन करते है । या फिर इन सत्रह सालों में आई गई केन्द्र या राज्य सरकार ने इस बारे में सोचा ? कभी किसी राजनेता ने इससेबात से हुए नुक्सान के बारे में कहा? नही न लेकिन हमारे ये "काठ के उल्लू" वो इससे पर भी हस्ते हुए कह देंगे की हम तो हर चुनावी भाषद में इससे बात को दोहराते है उत्तर प्रदेश में । अभी हाल ही में लिब्राहन आयोग की रिपोर्ट आई तब सभी तरफ़ चीख पुकार मच गई की हमने नही किया कुछ उन्हूने किया आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू हो गया यानि फ़िर एकता का हनन हुआ संसद जसी पवित्र जगह पर लोग आपस में लादे लेकिन क्या हुआ ,तभी आगई २६/११ की पहली बरसी सभी लोग उसपर बयान बाज़ी करने लगे और भूल गए फ़िर १९९२ के उस भारतीय एकता को डसने वाले दंश को जिसका दर्द आज तक यह भारत माँ नही भूली है । किसी ने सही लिखा था कुछ दिनों पहले अपने ब्लॉग में की लिब्रहान आयोग की जो आग एका-एक लगी थी वो २६/११ को ठंडी पड़ गई ....,....
तो आज ही सोचिये की कहाँ पहूची है हमारी एकता और अखंडता वरना बहुत देर हो जाएगी और ये नेता लोग जनता को ऐसे ही चलते रहेंगे ......

Tuesday, December 1, 2009

"क्या होगा उस महापुरुष के जाने के बाद"

मेरा कैमरा आज सुबह से टी.वी के आगे बैठा मैच देख रहा था और आंसू बहा रहा था मैंने पूछा क्या हुआ तो बोला मैसोच रहा था की क्या होगा जब क्रिकेट का यह महापुरूष संन्यास ले लेगा । सचिन रमेश तेंदुलकर या यूँ कहे की सचिन रिकार्ड तेंदुलकर तो कोई अतिश्योक्ति नही होगी ....मेरा कैमरा सत्य कह रहा है, आख़िर क्या होगा उनके बाद क्या हमारे देश में कोई और सचिन जन्म लेगा । भारत की क्रिकेट बोर्ड के आंतरिक द्वन्द को देखते हुए यह कहना मुश्किल है की उनके बाद क्या होगा ।

जिस बल्लेबाज़ को देखकर विपक्छी टीम के होश उड़ जाते थे कल कोउसकी गैरमौजूदगी में क्या हाल होगा टीम इंडिया का क्या किसी ने इस बारे में सोचा है , नही तो सोचिये क्योंकि अब ज्यादा दिन नही बचा है इस महापुरुष के संन्यास लेने में । आज जो व्यक्ति रिकार्डो के बिस्टर पर सोता जगता हो उसके संन्यास लेने के बाद उसके रिकार्डों का क़र्ज़ कौन वसूल करेगा कल यदि टीम इंडिया बिना इसके अपनी प्रसिद्धी नही साबित कर पायी तो यह हमारे लिया बहुत शर्मनाक होगा । सभी देश हमपर उंगलियाँ उठेयेंगे की हमारी टीम एक ही प्लेयर पर टिकी थी जिसके जाने के बाद सब तहस - नहस हो गया ।

कल को जब यह महान खिलाड़ी इस खेल को अलविदा कहेगा तो हमारे पास क्या होगा उसे देने के लिए तो आज ही से सोचना शुरू कर दीजिये दिलीप जी वरना बड़ी देर हो जाएगी .............


Sunday, November 29, 2009

"दलितों की कब्रगाह"

अरे यार फैज़ तुमने आज मुकुल श्रीवास्तव जी की बीबीसी पोस्ट पढ़ी क्या (मेरे कैमरे ने मुझसे पुछा )...नही यार कुछ ख़ास है क्या उसमे । हाँ ख़ास ही है हम जौनपुर के कितने करीब है पर नही जानते और उन्हूने इतनी दूर से पता लगा लिया । अरे क्या ये बातें गोल गोल घुमा रहा है सीधे सीधे बता बात क्या है ।
जानता है फैज़ जौनपुर जिले के कुल्हनामऊ गाँव में कई सदियों से दलितों को उनके मरने के बाद जलाने के बजाये गाडा जा रहा है । अगर मुकुल जी की जुबानी कहूं तो कुल्हनामऊ में ग़रीबी के कारण दलितों का अंतिम संस्कार हिन्दू रीति रिवाज़ों के अनुसार न कर उन्हें ज़मीन में दफ़नाया जाता है ।
मृतकों को दफ़नाने के लिए गाँव में ही एक कब्रिस्तान बना हुआ है । जहाँ उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री सुश्री मायावती जी दलितों के उत्थान के लिए एडी चोटी का ज़ोर लगा रही है । वही उनके एक सूबे में ग़रीबी के कारण दलितों का अंतिम संस्कार हिन्दू रीति रिवाज़ों के अनुसार न कर उन्हें ज़मीन में दफ़नाया जाता है । क्या गरीबी इतनी हावी है हमारे देश में की हम अपनी रीति रिवाजों के अनुसार अन्तिम संस्कार भी नही कर सकते । मुकुल जी के अनुसार गाँव के 80 वर्षीय बुज़ुर्ग मुरली बताते हैं कि अंग्रेजों के ज़माने से यहाँ मृतकों को दफ़नाया जाता रहा है। पहले यहाँ सिर्फ साधुओं को ही दफ़नाया जाता था लेकिन बाद में गाँव के ग़रीब लोग अपने संबंधियों को यहाँ दफ़नाने लग गए . अंतिम संस्कार के लिए शवों को दफ़ना देना एक सस्ता विकल्प है. मुरली के परिवार के सभी रिश्तेदार गाँव के इसी क़ब्रिस्तान में दफ़न हैं.वो बताते हैं कि एक मृतक के अंतिम संस्कार में कम से कम दो सौ किलोग्राम लकड़ी लगती है और बाकी के क्रिया कर्म के पैसे अलग। उनकी ख़ुद की तबीयत खराब है। पैसे की तंगी के कारण वे अपना इलाज़ नहीं करवा पा रहे हैं .
लेकिन मुरली यह कहना नहीं भूलते, "अगर अच्छा खाना मिले तो कोई ख़राब खाना नहीं खाएगा. अगर मेरा अंतिम संस्कार हिन्दू रीति रिवाज़ों के अनुसार हो तो मैं अपने आपको धन्य मानूँगा."
."कहाँ गया मुख्यमंत्री जी का वादा हम दलितों का उठान करेंगे क्या सिर्फ़ उन्हें आवास बनाकर देने से उनकी गरीबी दूर हो जाएगी । क्यों नही नरेगा को सुचारू रूप से लागो किया जाता की लूग अपने दह संस्कार के लिए लकडियाँ खरीद ले , क्यों नही समाज के ठेकेदार इस बात को समाज के सामने लाये फ़िर वही हुआ जो हमेशा होता है एक ज़िम्मेदार पत्रकार ने समाज के एक कटु सच को उजागर किया । दोस्तों ये मौका है इस vishaye पर charchaa न कर इस पर चिंतन करने का warna कल सिर्फ़ दलित ही नही...................

Monday, November 16, 2009

२२ जनवरी २००९ से १५ नवम्बर २००९ तक .......

ये क्या हुआ ......ये क्या हुआ ............ये क्या हुआ .........

अरे यार फैज़ आज क्या हुआ जो तुम ये गाना गा रहे हो (मेरे कैमरे ने मुझसे पूछा )॥अरे तुम को नही मालूम । तो सुनो राजनीति का बहुप्र्तिछित फैसला आज आ गया जिसका समाजवादी पार्टी के विपक्छी दल को बेसब्री से इंतज़ार था । .....अरे फैज़ कुछ विस्तार से बताओगे आख़िर हुआ क्या ??? अरे होना क्या था आज समाजवादी पार्टी के राष्ट्रिय महासचिव राजबीर सिंह ने पार्टी से इस्तीफा दे दिया । जिसके साथ ही मुलायम सिंह यादव और कल्याण सिंह की १० महीने की दोस्ती पर फुल स्टाप लग गया । अब ये दोनों एक मंच पर गलबहियाँ डाले नही नज़र आयेंगे । मुलायमसिंह ना तो कल्याण सिंह जिंदाबाद के नारे लगायेंगे और नाही कल्याण सिंह उन्हें आपने मित्र बताएँगे । अब तो आरोप प्रत्यारोप का सिलसिला शुरू होगा वो उन्हें दोषी कहेंगे और वो उन्हें ।ये बात किसी से नही छुपी की समाजवादी पार्टी के एक समुदाये विशेष के वोटो पर कल्याण सिंह के आने से विपरीत प्रभाव पड़ा और पार्टी की यह दशा हुई, जिसका सीधा उदाह्रद फिरोजाबाद उपचुनाव में मुलायम सिंह की पुत्रवधू की हार है साथ ही कही भी उसके प्रत्याशी का न जीत पाना ,और लोक सभा चुनावों में सिर्फ़ २३ सीते पाना वो भी सत्ता में रहते हुए । पर कल्याण सिंह जी तो अलग ही राग अलाप रहे है की अगर मे और मेरा बेटा न रहे होते तो उन्हें सिर्फ़ १४ सीटों से संतोष करना पड़ता ९ सीटों पर तो मैंने ही जीत दिलाई है । और तो और हम ख़ुद नही गए थे उनके यहाँ पर वो ख़ुद आए थे हमारे पास ......

मई तो यहाँ यही कहूँगा की "चूहे ने फसल ख़राब कर दी"क्योंकि समाजवादी पार्टी के वोट बैंक में सेंध तो लग ही चुकी है .....अब मुलायम सिंह जी क्या करेंगे.........

Monday, November 9, 2009

"भगत सिंह होने का मतलब"


"जालिम फलक ने लाख मिटने की फ़िक्र की ,हर दिल में अक्स रह गया तस्वीर रह गई "

"मै एलान करता हूँ की मै आतंकवादी नही हूँ ,और अपने क्रन्तिकारी जीवन के आरंभिक दिनों को छोड़कर शायद कभी नही था और मै मानता हूँ की उन तरीकों से हम कुछ हासिल नही कर सकते ".......भगत सिंह का ये एलान बहुत कम ही लोग जानते होंगे । निसंदेह भगत सिंह भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष के सर्वाधिक लोकप्रिय शहीदों में से एक है । हलाँकि अधिकतर उन्हें गोली चलने वाला युवा राष्ट्रवादी की रोमांटिक छवि से परे नही देख पाते थे । इसकी वजह शायद यह है की उनकी यही छवि औप्नीवेशक दौर के सरकारी दस्तावेजों में दर्ज की गई । लोग भगत सिंह को ऐसे शख्स के रूप में देखते थे , जो अपने हिंसात्मक कारनामो से ब्रिटिश शासन को आतंकित कर देता था । उनकी ज़बरदस्त हिम्मत ने उन्हें एक प्रतिमान बना दिया । भगत सिंह को आज भी प्यार और श्रधा से देखा जाता है ,लेकिन क्या हमें उनकी राजनीति और विचारों के बारे में पता है ? और क्या उनके हिंसा व आतंक में विश्वास के शुरूआती नज़रिए के बारे में पता है ?(जो मौजोदा आतंकवादी हिंसा से एकदम अलग चीज़ थी ) जिसे उन्हूने शीग्र ही एक ऐसे क्रन्तिकारी दृष्टिकोण में बदल लिया जो स्वाधीन भारत को एक धर्मनिरपेक्ष समाजवादी और समतावादी समाज में बदलने से वास्ता रखता था । भगत सिंह को जनता की तरफ़ से इस तरह का मुक्त समर्थन क्यों मिला ? जबकि उसके पास पहले से ही नायकों की कमी नही थी ? एस सवाल का जवाब देना आसान नही है । जब देश के सबसे बड़े नेताओं का तात्कालिक लक्छ्य स्वतंत्रता प्राप्ति था उस समय भगत सिंह जो बमुश्किल अपनी किशोरावस्था से बाहर आए थे ,उनके पास इस तात्कालिक लक्छ्य से परे देखने की दूर दृष्टि थी । उनका दृष्टिकोण एक वर्गविहीन समाज की स्थापना करना था और उनका अल्पकालिक जीवन इसी आदर्श को ही समर्पित रहा । भगत सिंह और उनके मित्र दो मूलभूत मुदों को लेकर सजग थे जो तात्कालिक राष्ट्रिय त्तथा अंतर्राष्ट्रीय परिपेछ्य में प्रासंगिक थे । पहला --- बढाती हुई धार्मिक व सांस्कृतिक वैमनस्यता और दूसरा समाजवादी आधार पर समाज का गठन । भगत सिंह और उनके कामरेड साथियों ने क्रांतिकारी पार्टी के प्रमुख लक्छ्यों में से एक बटोर समाजवाद लाने की ज़रुरत महसूस की ।सितम्बर १९२८ में दिल्ली स्थित फिरोज़ शाह कोटला के खण्डहरों में महत्वपुर्ण क्रांतिकारियों की बैठक में इस पर विचार विमर्श के बाद हिन्दुस्तान रिपब्लिक एसोसिएशन ( H R A ) में सोशलिसत शब्द जोड़कर HSRA बना दिया गया । भगत सिंह अपने साथियों को यह समझाने में सक्छ्म थे की भारत की मुक्ति सिर्फ़ राजनितिक नहीं बल्कि आर्थिक आज़ादी में है। समाजवाद के प्रति उनकी प्रतिबधता ८ अप्रैल १९२९ को उनके दुआरा असेम्बली में बम्ब फेंकने की कारवाही में भी प्रकट हुई । भगत सिंह दरअसल १९२० के दौर में सम्प्रदाइकता के बड़ते खतरे के प्रति सजग हुए । उसी dashak में RSS तबलीगी जमात का उदय हुआ । उन्होंने साम्प्रदायिकतावादी प्रतिस्पर्ध को बढावा देने की नीति पर सवाल किए । एक राजनितिक विचारक के रूप में वे तब परिपक्व हुए जब वो अपनी शहादत से पहले दो साल जेल में गुजारे । उनकी जेल में लिखी डायरी पोरी स्पष्टता से उनकी राजनितिक बनावट के विकास को दिखाती है । जेल में ही उन्होंने ने अपना विक्यात लिख " मे नास्तिक क्यों हूँ " लिखा । यह लिख तार्किकता की दृढ पछ्धार्ता के साथ अंधविश्वास का पुरजोर खंडन करता है । भगत सिंह मानते थे की धर्म शोषकों के हांथो का औजार है , जिसका इस्तेमाल वो जनता में इश्वर का भय बनाये रखकर उनका शोषद करने के लिए करते है । HSRA के नेताओं का वैज्ञानिक नज़रिया समये के साथ विकसित हुआ और उनमे से अधिकतर समाजवादी आदर्श या साम्यवाद के करीब आए । वे व्यक्तिगत करावाहियों के बजाये आन्दोलनों में भरोसा रखते थे । भगत सिंह उस संघर्ष को लेकर एकदम स्पष्ट राय रखते थे , उन्होंने अपने आखिरी दिनों में कहा था की ..........

" भारत में यह संघर्ष तब तक जारी रहेगाजब तक मुट्ठी भर शोषक आम जनता के श्रम का शोषद करते रहेंगे । यह कोई मायने नही रखता की ये शोषक खालिस ब्रिटिश या भारतीय दोनों सम्मिलीत रूप से है या विशुद्ध रूप से भारतीय है ।"

तो डालिए रौशनी उनके द्बारा सोचे गए शासन के वैकल्पिक ढांचे पर , जिसमे आतंक या हिंसा नही बल्कि सामजिक और आर्थिक न्याय सर्वोपरी होगा ।

Wednesday, October 21, 2009

"आख़िर क्यों बेच रहे है माँ "

अरे चचा बड़े परीशान दिखाई पड़ रहे है क्या हुआ , अरे क्या बताये बेटा मेरी गाय अब दूध नही देती । मुझे ही उसे अलबत दिन भर चारा खिलाना पड़ता है एक तो आमदनी कम दुसरे घर का खर्चा और उसपर ये बिना मसरफ की गाय क्या करून बड़ा परेशान हूँ सोचता हूँ इसे बेच कर दूसरी खरीद लूँ कम से कम उसका दूध बेचकर कुछ आमदनी तो हो जायेगी ,घर का खर्चा तो चलेगा वरना अब तो भूखे मरने की नौबत आ गई है । ..........

अरे फैज़ आज की ख़बर पढ़ी क्या ,कुछ लोगों को पुलिस ने गाऊ हत्या के जुर्म में पकड़ा है । अरे यार अब इनसे कौन कहे की अगर ये गौ हत्या करने वाले ये नही करेंगे तो और क्या करे जब एक भूख वसे मरता किसान अपनी बिसुक चुकी गए का मूल लगता है तो उसे अपने बच्चों की फ़िक्र होती हो जो भूख से तड़प रहे होते सभी धर्म ये मानते है की गौ की हत्या नही करनी चाहिए । लेकिन जब एक गरीब किसान इसे कसाई के हांथों में बेचकर अपने बच्चों के लिए भोजन खरीदता है। क्या कभी किसी ने इस बात के पीछे का मर्म जानने की कोशिश की क्यों आखिर रोज़ गौ हत्या में इजाफा हो रहा है। जब साहूकार किसी गरीब को अपने पैसे के लिए डराए गा तो वो बेचारा क्या करेगा अखीर बच्चा माँ के ही पास तो जाता है । गौ माता अपनी जान देकर अपने बच्चे की सहायता करती है ।

किंतु यहाँ सवाल उठता है की गाये बेचीं ही क्यों जाती है क्यों नही उनका समुचित रखरखाव होता । लोग अपनी जिम्मेदारियों से पीछे हटकर सिर्फ़ धर्म के नाम पर सवाल खड़े करते है की उसने ऐसा क्यों किया वगैरा -वगैरा ।आज सभी महानगरों में छुट्टा पशु की समस्या बनी है ,लेकिन कोई भी इस दिशा में समुचित कदम नही उठा रहा है । जब कोई गौ माता ट्रक या बस के नीचे आकर मर जाती है तब कोई भी संस्था सामने नही आती लोग भी अपनी नाक पर रुमाल रखकर रस्ते बदल लेते है ,तो फिर पाखण्ड का ये सिलसिला सिर्फ़ एक मुद्दे पर क्यों , क्या हमारा समाज इतना खोखला हो गया है । बस इतना ही कहना चाहूँगा की आख़िर ऎसी परिस्थति आए ही क्यों की गौ माता को बेचा जाए । अगर किसी की आस्था को मेरे लिख से दुःख pahunchaa हो तो मुझे chhama करें ।
लेकिन इस बात पर sochiye और bataiye ........

Thursday, October 8, 2009

"ये क्या है ?"


आज उस बूढे ने आपनी जिंदगी भर में ऐसा अपमान शायद आज पहली बार सहा था । वह कोई बहुत अमीर तो नही था लेकिन mehnat और स्वाभिमान की अटूट पूँजी उसके पास थी । आँखे मारे थकान के बोझिल हो गई थी । बंद होती आँखों में गुज़रा ज़माना याद आने लगा जब वह अपने बेटे को कंधे पर बिठाकर गाँव के मेले घुमाया करता था । छोटे से बच्चे को यदि पेड़ की डालपर बैठी चिडिया दिख जाती वह wah अपने पिता से पूछता था की "पिताजी वह क्या है ?"वह बताता "बेटा चिडिया है ।" वह बार बार पूछता और वह भी बार-बार मुस्कुरा कर बताता की चिडिया है । धीरे धीरे समय ने करवट ली बेटा पढ़ लिख कर अफसर बन गया और शहर में बस गया । ......हिम्मत अब जवाब देने लगी थी ,न चाहते हुए भी उसे अपने बेटे के पास शहर जाना पडा । उसे देखते ही बहू ने पैर छूकर सौभाग्यवती होने का आशीष पाना तो दूर ,बड़ा बुरा सा मुह ,बुरा तो उसे भी बहुत लगा पर ज़माने का रंग सोचकर शांत रहा ।

पर आज तो गज़ब हो गया , बेटे के दोस्तों की पार्टी चल रही थी और उसने केवल इतना ही तो पूछा था की "बेटे यह क्या है ? " और इसी "क्या है " के कारण बेटे और बहू ने उसे दरवाज़े के बाहर का रास्ता दिखला दिया .......


अब जब वो बेघर था तो साड़ी इन्द्रियां इस्तीफा दे बैठी थी और उसकी चीर्निद्रा को फुटपाथ ने अपने आँचल में सहर्ष samett लिया .......मे पूछता हूँ इस समाज से "आख़िर ये क्या है ?"

Wednesday, September 16, 2009

ये क्या हो रहा है ......

उफ़ कैसा मंज़र था लखनऊ के उस इंजीनियरिंग कॉलेज का चारों तरफ़ भय का माहोल था सभी लड़कियां पूनम की मौत के बाद सहमी हुई थी । कोई भी कुछ बताने को तैयार नही था । जैसे लड़कियों को कॉलेज प्रशासन ने ने कुछ भी बताने को मना किया हो ......ये सब हुआ रेगींग के चलते जिसके लिए सविधान में एक भरी भरकम क़ानून बनाया गया है । लेकिन वो बड़े घर के लड़कों के लिए नही है .....आप सोच रहे होंगे क्यों तो सुनिए जो लड़के अभी रेगींग के मामले में पकड़े गए थे बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में उन्हें छोड़ दिया गया । क्यों जानते है ,उनके वकीलों की दलील पर एक नज़र डालिए ...."ये सभी छात्र सभ्य घर के है तथा जेल में रहने से उनके साफ सुथरे मन पर भारी असर होगा " और कोर्ट ने सभी को ज़मानत दे दी । अब कौन समझाए इन्हे की अगर इनके व्यवहार पर जेल में रहने से असर पड़ेगा तो फिर बाहर रहते हुए भी वो कहाँ कोई अच्छा काम कर रहे है । .....

अब आप ही बताइए क्या ये ठीक है कल को वकील साहब का लड़का या लड़की रेगींग का शीकर होंगे तो वो क्या दलील देंगे ....कल जो कुछ भी हुआ उसके लिए हम आप भी ज़ीम्मेदार है। क्या ये हमारा कर्तव्य नही है सोचिये.....

Sunday, September 13, 2009

अब तेंदुओं की बारी .............

क्या भा फैज़ कहाँ थे आज कल कोई नई पोस्ट नही आ रही थी तुम्हारी कहाँ थे तुम ? अरे कही नही यार रमजान चल रहा है न मौका नही मिल रहा था । जनता है फैज़ आज कल लोग शेर के साथ साथ तेंदुओं को भी नही छोड़ रहे है । वन्यजीव पर काम कर रही गै़र सरकारी संस्था 'वाइल्डलाइफ़ प्रोटेक्शन सोसाइटी आफ़ इंडिया' के अनुसार इस साल के शुरुआती दो महीनों में ७२ तेंदुए मारे जा चुके हैं । वाइल्ड लाइफ़ प्रोटेक्शन ऑफ़ इंडिया के मुताबिक़ तेंदुओं की सबसे ज़्यादा मौत झारखंड राज्य में हुई है । यहाँ २१ तेंदुए मारे जा चुके हैं। झारखंड एक ऐसा राज्य है जहाँ तेंदुओं की संख्या सबसे ज़्यादा है । कर्नाटक में ११ तेंदुए मारे जा चुके हैं जबकि हिमाचल प्रदेश में नौ तेंदुए मारे गए हैं। हालांकि ये संस्था इन मौतों का अलग अलग कारण बताती है ।


वाइल्ड लाइफ़ प्रोटेक्शन सोसाइटी आफ़ इंडिया की निदेशक बलिडा बताती हैं, " तेंदुओं को ज़हर दिया जाना, सड़क दुर्घटना, बदले की भावना के तहत कार्रवाई, शिकार, बिजली का करंट और जानवरों और मनुष्य के बीच संघर्ष इनकी मौत के मुख्य कारण हैं।" बलिडा तेंदुओं की घटती संख्या के लिए ग़ैरक़ानूनी शिकार को मुख्य कारण नहीं मानती हैं ।
पर्वतीय क्षेत्रों में रह रहे लोग तेंदुओं को नहीं चाहते क्योंकि लोग उनसे डरते हैं। तेंदुए गांव मे शिकार की तलाश में आते हैं क्योंकि जंगल में उन्हें अपना शिकार नहीं मिलता ।
रिपोर्ट के मुताबिक़ इस महीने की शुरुआत में तेंदुओं की साढे़ चार किलो हड्डियां और ३३ खालें बरामद की गईं और ३९ तेंदुए अलग अलग परिस्थितियो में मृत पाये गए.
शिकार के मामलों पर रिपोर्ट बताती है कि वर्ष २००८ में १६१ तेंदुओं का शिकार किया गया और १९९९ से २००८ तक ३१८९ चीतों का शिकार किया गया ।

भारत में वन्य जीवों का शिकार करना अवैध है फिर भी रोज़ यहाँ कई वन्य जीवों का शिकार होता जोकि एक भयंकर समस्या है । यहाँ वन्य जीवों का व्यापार अवैध हैं । तेंदुए के अंगों का इस्तेमाल दवाओं के लिए किया जाता है जिनकी की़मत बहुत ज़्यादा होती है ।
इनकी हड्डियों को बाघों की हड्डियों के विकल्प के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है । साथ ही इनकी खोपडी़ और पंजों की भी मांग काफी़ होती है । चीन और दक्षिण पूर्व एशियाई देश इनके अवैध व्यापार के बडे़ केंद्र हैं । चीन ही नहीं अमरीका, जापान और जर्मनी तक अवैध व्यापार हो रहा है । नशीली दवाओं और हथियारों के बाद वन्य जीवों की तस्करी दुनिया का तीसरा बडा़ अवैध व्यापार है ।


आंकड़ों पर नज़र डालें तो २००८ में ११ हज़ार चीते थे। बाघों की बात की जाए तो इस दौरान लगभग १४११ बाघ जीवित थे । वन्य जीव विशेषज्ञों के अनुसार तेंदुओं की हत्या की दर बाघों से कहीं ज़्यादा है। बाघों की घटती संख्या को स्वीकारते हुए सरकार ने आयोग का गठन भी किया था। लेकिन तेंदुओं की घटती संख्या पर अभी तक सरकार का ध्यान नहीं गया है । वन्यजीव पर काम करने वाले जानकारों का कहना है कि वे केवल समस्या को उठा सकते हैं लेकिन कार्रवाई की पहल तो सरकार को करनी होगी क्योंकि ये सवाल जंगल, जानवर और मनुष्य के बीच पैदा हुई खाई को पाटने का भी है।

तो अब तुम बताओ फैज़ क्या होगा समाज का जब शेर और तेंदुओं को इंसान नही बख्श रहा है तो कल क्या वो अपने जैसे इंसानों के अपने फायदे की स्थिति में बक्शेगा .....सोचिये .........

Thursday, August 20, 2009

"आस्थ का सिक्योरिटी चेक"


आप सोचेंगे मैंने इस पोस्ट का नाम ये क्यों दिया ,तो सुनिए मुद्दा शिर्डी के साईं बाबा से जुडा हुआ । काफी दिनों से चल रहे वीवाद का आज निस्तारद तो हो गया मगर एक नया मुद्दा ये है की यदि बाबा की चाँदीकी चरण पादुका अमेरिका ले जाई गई तो क्या उसे बिना सिक्योरिटी चेक के वहां जाने दिया जाएगा । .....सभी इस बात से वाकिफ है की शिर्डी के साईं बाबा के भक्त इस बात को कत्तई बर्दाश्त नही करेंगे क्योंकि शिर्डी के साईं बाबा में सभी धर्म के लोगों की आस्था है । भारत जैसे धर्म प्रधान देश में आस्थ से खिलवाड़ महंगा पड़ सकता है । कल को कोई भक्त ये कह सकता है की देश में स्वैन फ्लू इसी वजहा से फैला यानी आस्था के कंधो पर पैर रखकर अंधविश्वास उंचा हो जाएगा । ...........


क्या कोई भी व्यक्ति इस बात की गारंटी ले सकता है की उनकी चरण पादुका को सिक्योरिटी चेक से नही गुज़रना होगा । .....यह तो हम सोच भी नही सकते क्यों ...क्योंकि जब हमारे ही देश में विदेशी कंपनियाँ हमरे पूर्व राष्ट्रपति को चेक कर सकती है तो फिर वो तो .........

फिर जो अभी हाल ही में शारूख खान के साथ हुआ ,अमेरिका में उसका तो क्या कहना । मै तो प्रबुध्जानो को यही राय देना चाहूँगा की कुछ भी करे लेकिन आस्थ को चोट पहुंचाए बिना । वरना यह छोटा सा मुद्दा बहुत विकराल रूप अपना कर सकता है ........