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Sunday, August 15, 2010

स्वतंत्रत दिवस की बधाइयाँ


सारे जहां से अच्छा हिंदुस्तान हमारा....... हमारा सारे जहाँ से अच्छा ................

आज के दिन हमें आज़ादी मिली जी हाँ आज आज़ादी का पर्व है वो आज़ादी जिसके लिए हामरे देश के वीर सपूतों ने अपने जानो की बजी लगा दी। आज हम सब स्वतंत्र है ...लेकिन किसकी वजह से उन अमर सपोतों की वजह से मई अपने कैमरे और पूरे ब्लॉग जगत की ओर से उन वीर सपूतों को नमन करता हूँ ...............
भारत माता की जय .............भारत माता की जय ..............भारत माता की जय .............

Saturday, August 14, 2010

'आज़ादी की खुशियों के असली हकदार '


आपनी आज़ादी को हम हरगिज़ भूला सकते नहीं , सर कटा सकते है लेकिन सर झूका सकते नहीं .........
आज़ादी का यह तराना आज सभी की जुबान पर एक-एक रहा है लोग इसे गुनगुनाना चाहते है क्यों ?
क्योंकि कल के ही दिन हमारा देश आज़ाद हुआ था उन नापाक इरादे वाले अंग्रेजों से जिनकी राजनीति थी फूट डालो और राज करो ,लेकिन हमारे देश के वीर सपूतो ने तब से लेकर आज तक भारत देश को कभी अलग नहीं होने दिया यहाँ जितनी आज़ादी है शायद ही किसी देश में हो .................
लेकिन यार फैज़ सुच में ये किसकी आज़ादी है और किस्क लिए सबसे ज्यादा ख़ुशी का दिन है ......अरे यार सब जानता है की हमारे देश के फौजियों ने देश के लिए हमेशा जान की बजी लगाई है यह आज़ादी उनकी है हम उनके आभारी है ...........
हम
सब की तरफ से भारत माँ के उन वीर सपूतों को सलाम जिन्होने हमारी भारत माँ की रक्षा करते करते आपनी जन न्योछावर कर दी ....
जय भारत -जय जवान

Sunday, August 1, 2010

"आज दोस्ती अजनबी-सी लगती है"

आज मेरा कैमरा सुबह से एक कविता दोहरा रहा है कह रहा है आज दोस्ती का पर्व है । हाँ आज १ अगस्त है यानि फ्रेंडशिप डे ....वो कविता जो मेरा कैमरा दोहरा रहा था मुझे नहीं मालूम किसने लिखी है पर है बहुत अछि मैचाहता हो की आप सब भी इसे पड़े अछि लगे तो बताइयेगा ज़रूर ............
दर्द में कुछ कमी-सी लगती है
जिन्दगीअजनबी-सी लगती है
एतबारे वफ़ा अरे तौबा दुश्मनी दोस्ती-सी लगती है
मेरी दीवानगी कोई देखे धुप भी चांदनी-सी लगती है
सोंचता हूँ की मैं किधर जाऊँ हर तरफ रौशनी-सी लगती
है आज की जिन्दगी अरे तौबा मीर की शायरी सी लगती है
शाम-ऐ-हस्ती की लौ बहुत कम है ये सहरआखरी-सी लगती है
जाने क्या बात हो गयी यारों हर नजर अजनबी-सी लगती है
दोस्ती अजनबी-सी लगती है....... ।
आप सभी को दोस्ती के इस पर्व की ढेरों बधाइयाँ मेरे और मेरे कैमरे की तरफ से .........

Tuesday, July 27, 2010

"वो मानसून का पकौड़ा"

आ छि ........आ छि .......आ छि ....अरे कैमरे क्या हुआ तुझे छिक क्यों रहा है इतना ,मन किया था न बहार मत जा बम्बई में बारिश हो रही है , वैसे तू गया कहाँ था ? मै तुम्हारी दोस्त शिरीन से मिलने वाशी उसके ऑफिस गया था वहां पंहुचा ही था की बारिश शुरू हो गई । पर एक बात है उस्ताद मज़ा खूब आया .....

वहां बगल में ही जो विश्वज्योति रेस्टुरेंट है उसकी चाय पी रहा था तो बदन में सिहरन सी दौड़ रही थी...वहां से सड़क का नज़ारा साफ दिख रहा था लोग भागे जा रहे थे बारिश से बचने के लिए और कुछ मेरी तरह दिलेर लोग भीग कर चाय पीने आरहे थे तभी शिरीन ने मुझे फोन किया पुछा कहाँ हो मैंने कहा बस चाय और पकौड़े का मज़ा ले रहा हूँ .....बस फिर क्या था कर दी फरमाइश लेते आइये मै भी भीग चूका था सो उसी बारिश में भीग कर नवी मुंबई के सेक्टर १७ स्थित शिव बिल्डिंग में चौथे तलपर पहुँच गया । वहां जब पहुच तो भीगे चूहे की तरह था आप की दोस्त भी हँसे बिना नहीं रह सकी ........

मज़े की बात तो ये है की पकौडे की और चाय की खुशबु से सभी की नाक की इन्द्रियां मचल गई और सभी दौड़ पड़े मेरी तरफ भाई ये लीजिये तौलिया और सर पोछिये लाइए ये पैकेट मुझे मुझे मुझे दे दीजिये और शिरीन जी को तो मज़ा आ रहा था उन्हें तो जैसे हंसी का दौरा आया था । कुछ ही देर में पूरा ऑफिस हम दोनों के साथ बैठा पकौड़ो का मज़ा ले रहा था, क्या पकौडे था और साथ में हो रही रिम झिम बारिश और अदरक वाली चाय । तुम भी वहां होते तो मज़ा आजाता .........

अच्छा ये बता तो वापस कैसे आया ? अरे वो शिरीन जी ने ड्रॉप किया न यहाँ तक ...मै तो अब ज़िन्दगी भर नहीं भूल सकता ये पकौड़ा आ छि आ छि .............काश मै भी वह होता सच कितना मज़ा आया होगा ये बारिश है ही ऐसी चीज़ पर मुंबई तो बारिश आते ही चिल्ला उठती है हमरे उत्तर परदेश की तरह नहीं है की सबका चेहरा खिल उठे बारिश देख कर ......

Wednesday, July 21, 2010

"हिम्मते मर्दानी - मददे झाँसी की रानी"

अरे फैज़ कहा थे तुम कितना अच्छा नाटक आ रहा था झाँसी की रानी ......."खूब लड़ी मर्दानी वो तो झाँसी वाली रानी थी "...जनता है कैमरे इस नाटक का लड़कियों के मन पर बहुत गहरा और अच्छा असर देखने को मिला है तभी ये नाटक इतने कम समय में लोकप्रिय हो गया है । आज लड़कियां रानी लक्ष्मी बाई की तरह देश के कार्यों में बढ़ चढ़कर हिस्सा लेना चाहती है खासकर फ़ौज में भर्तीहोने के लड़कियों के जज्बे में एका एक बढ़ोत्तरी हुई है। सब घरों में लोग लड़कियों को झाँसी की रानी के किस्से सुना रहे है .......

पहले एक कहावत हुआ करती थी "हिम्मते मर्दा - तो मददे खुदा " मेरी एक दोस्त रेनू ने तो एक नई कहावत रच डाली है ये सीरियल देख कर "हिम्मते मर्दानी - मददे झाँसी की रानी " क्यों अच्छीहै न , हाँ हाँ बहुत अच्छी है और सही भी है , उस लक्ष्मी बाई ने हमें फिरंगियों के अत्याचार से बचाया था और आज की अनगिनत लक्ष्मी बाई हमें यहाँ बैठे धूर्तों से बचाएंगीजो आज हर छेत्र में विराजमान है ...............

Monday, June 28, 2010

"संकटमोचक के दूत बने संकट का पर्याय "


आज मै काफी दिन बाद बनारस लौटा दिल्ली गया हुआ था अपनी जॉब के सिलसिले से मेरे कैमरे ने कहा चल यार फैज़ छत पर सोते है फिर क्या था हम दोनों छत पर चले गए .............
सुबह मैंने आँख खोली तो खुली की खुली रह गयी एक बंदर के बच्चे ने मेरे पैर की अपने अपने मूह में रख रखा था और उसे चाट रहा था मेरी तो आवाज़ ही अटक गयी खैर वो मुझे जगता देख करे वहां से भाग गया .................
जी हाँ ये हल है हमारी कशी नगरी का जहाँ आज कल संकटमोचक के दूत संकट का पर्याय बन गए है ये अपनी मन मणि सब करते रहते है जब कहते है आप के घर में प्रवेश कर जाते है और फिर वहां उधम मचाते है ,आप बेबस है ये स्य्भा जब मोर्निंग वाल्क के लिए निकलते है तो फिर रस्ते में आने वाले किसी भी वास्तु को नहीं छोड़ते चाहे वो कपडा हो या फिर बर्तन ये उठा ले जायेंगे और दूर कही छोड़ देंगे ....
मैंने पता लगाने की कोशिश की तो इधर बीच अस्पतालों में बन्दर के द्वारा कटे गए या घायल किये गए मामलों में बढ़ोतरी हुई है। ये कभी भी आक्रामक हो जाते है जैसे इन्हें किसी ने ऐसा बना दिया हो।

आखिर मेनका गाँधी जी का इसपर क्या सोचना है , वो तो जन्तुओ पर कुछ होते ही चीलाने शुरू कर देती है ...अब बताये इन मासूम इंसानों का क्या जिन्हें बिना बात की सजा मिल रही है क्या किया जाये इन बंदरो का ........
हमें और जिला प्रशासन को भी इस बारे में सोचना होगा की बन्दर इतने क्रूर क्यों होगये है ..........

Wednesday, May 19, 2010

"राहुल-विकास-कांग्रेस"

"हमें जातिगत या एक समुदाय विशेष को लेकर ये लड़ाई नहीं जितनी है हमें सबको साथ लेकर चलना है " ये वाक्य है कांग्रेस पार्टी के युवराज राहुल गाँधी का जो कल अहरौरा जो की तिन जिलो की त्रिशंकु सीमा पर स्थित है । लोगों ने अपने उस युवराज के लिए पलक पावडे बिछाये थे तो सर्कार ने सुरछा का जल बिछाया था ।

मेरे कैमरे ने जब कल आ कर ये सब बाते बताई तो मई भी प्रफुल्लित हो गया । उसने आगे बताया की लोग आपस में बाते कर रहे थी की " अरे इ तो राजीव बाबु जैसन बाटे " लोग उनके इंतज़ार में ४५ डिग्री तापमान में भी पंडाल में बैठे रहे । जब राहुल गाँधी आये तो लोगों ने उनका अभिवादन हर हर महादेव का नारा लगा कर किया जवाब में राहुल बाबा ने भी हाँथ हिलाकर उनका अभिवादन का जवाब दिया ।

जब वो मंच पर चड़े तो बिना कुछ कहे अपने १२ मिनट के भाषण में सब कुछ कहा सिवाए नक्सल वाद के ,वो इस मसले पर चुप्पी मर गए इस से शायद पूरा मीडिया समाज उदास हुआ होगा उसे कोई "मसाला"जो नहीं मिला ।

सब तरफ सिर्फ विकास में निचले पायदान पर चल रहे उत्तर प्रदेश की चर्चा थी सभी ने इसी बारे में बात कही की प्रदेश सरकार केंद्र की नीतियों को सही से चला नहीं पा रही है । खैर भगवन बचाए इस सरकार से मेरे यहाँ विधुत भी चली गयी है और मई पसीने में नहा कर नहीं लिख पाऊँगा अब नहीं लिखा जायेगा मुझसे .....अगली पोस्ट के लिए अलविदा .

Monday, May 17, 2010

"नक्सलियों का लाल सलाम "

यार फैज़ देखा दंतेवाडा में एक बार फिर खून की होली खिली नक्सलियों ने , पर फिर भी आँखे नहीं खुलेगी सरकार की , कोई समुचित उपाय नहीं किया जायेगा बस कुछ दिनों तक ओछी राजनीती होगी इस मुद्दे पर और फिर सबकुछ शांतकुछ दिनों के बड फिर होगा कोई बड़ा नक्सली हादसा और फिर निकल आएगा बोतल में से जिनबाहर
आखिर इन सब चीजों से नुक्सान किसका है मेरा कैमरा जो कह रहा है क्या उस पर दयां नहीं देना चाहिए आखिरमर कौन रहा है , बेगुनाह जनता ही लेकिन कौन समझाए इन्हें ये तो सिर्फ सहायता राशी देकर अपना पिंडछुड़ाने की जुगत में लगे रहते है की कितना अधिक दे कर अपना दामन साफ़ कर ले।
कोई उनसे जा कर पूछे जिन्हूने अपना सुहाग अपना पिता अपना बेटा खोया है उनके दिल पर क्या गुज़रती है क्याचाँद कागज़ टुकड़े उनका दर्द कम कर देंगे नहीं ???

तो फिर क्यों नहीं नक्सलियों के बारे में कुछ नहीं सोचा जाता क्या जवाहर लाल नेहरु ने आदिवासियों के लिए जोयोजनायेशुरू की थी जिनमे रिहंद बाँध भी था क्या वो उससे संतुष्ट नहीं हैक्या उन्हें कुछ और चाहिए लेकिनविपदा ये है की कौन पूछे उनसे सब तो डरते है हम क्यों ऐसे लोगों को पदासीन करते है जो डरपोक होते है सिर्फ़ पैसा कमाने के लिए कुर्सी पर बैठते है नाकि आम जनता के बारे में सोचने के लिए ......

क्या होगा आने वाले वक़्त में हमारे देश का सोचिये वरना हर हिन्दुस्तानी नक्सलियों की रह पर चल पड़ेगा .......