Saturday, April 4, 2009
क्या होगा अब
ये नारे तो आब आम हो चुके है क्योंकि आ गया है दुनिया के चालबाजों,अमन- चैन को बेचने वालों ,जाती गत राजनीती करने वालो का महा उत्सव ....."चुनाव "फ़िर भी हमारी भोली भली जनता इनका जी जान से सहयोग देती है इन के झूठे आश्वासनों को तूफानी हवा देती है और ये जीत जाते है ........क्या जीतने के बाद ये उन लोगों का हाल पूछते है जो इनके लिए दिन रात लगे रहते है .......इस बारे में मैंने लोगों से पूछातो कुछ ने वही पुराना रटा-रटाया जवाब दिया और बोले "अरे इ साहब लोगन का चोचला है हमका तो सरकार रही तबहूँ काम करना है न रही तबहूँ".....एक दुसरे ग्रेजुएट ने कहा वोट तो हम देते है पर फर्क क्या पड़ता है । तो क्या हम जानवर से बत्तर नही है सोचिये ........मैंने कही एक कही एक कहानी पढ़ी थी वो पेश कर रहा हूँ शायद आप को पसंद आए......
एक कुत्ते ने गधे से कहा -ये कैसा जानवर है इंसान जो बात बेबात लोगों का खून बहाता है हर जगह बेमतलब की आशांति फैलाता है,अपने स्वार्थ के लिए दूसरों का बुरा चाहता है , कागज़ के एक tukade के लिए एक दुसरे को मारता है ,पेट भरा हो तो भी और खाने को मांगता है , न ख़ुद चैन से रहता है न हमें रहने देता है ,हमें तो शर्म आती है ये कहते हुए की हम इनके बीच में रहता है । हमारा बस चले तो इनका सफाया कर दे पर हने इनके जैसे संस्कार नही दिए गए ,हम तो अपनी बिरादरी के लिए जीते मरते है ,हमारी नज़रो में ये सबसे ज़्यादा बुरे है । हमें तो लात मारते है पर ख़ुद तो लात ख्हने के भी काबिल नही है.......पता नही ये जीवन क्यों देते है जब ख़ुद जीने के लायक नही ।
Friday, April 3, 2009
चुनावी कबूतरबाजी
आज मेरा कैमरा मुझसे नाराज़ है ......वो मुझे छोड़कर जाने की बात कर रहा है ......वो कह रहा था की फैज़ के दिल में मेरी लिए अब कोई जगह नहीं है वो तो अब दिन भर अपने कंप्यूटर से चिपका रहता है ......सब घर वालो ने उसे समझाया लेकिन वो मानने को तैयार नहीं है...मैंने भी उससे कह दिया ठीक है फिर तो भी उन्ही कतार में आएगा .....अब वो बैचैन हो उठा और बोला फैज़ तुम किस कतार की बात कर रहे हो मुझे भी तो बताओ,मैंने कहा क्यों अब क्या हुआ वो बड़े विनम्र लहजे में बोला माफ़ कर दो यार बच्चा हूँ .......तभी पीछे से किसे ने कहा चलो लौट के बुधू घर को आये ।
मैंने कहा जनता है मै किन कबूतरों की कतार की बात कर रहा था ,कुछ देर चुप रहने के बाद वो बोला मै कबूतर नज़र आता हूँ क्या । मैंने कहा अरे मै उन कबूतरों की बात नहीं कर रहा हूँ जो शांति का प्रतीक होते है ,मै तो राजनितिक कबूतरों की बात कर रह हूँ जिनकी मंडी चुनाव के ठीक पहले लगती है । सभी दल अपनी अपनी बोली लगते है । वे अपने दल की मलाई दिखाते है ताकि उनकी मलाईदार रबडी देखकर ये फंस जाये लकिन ये कबूतर भी कम चालू नहीं होते ये उसी दल में जाते है जिसकी सत्ता बनती दिखाए पड़ती है क्योंकि मंत्री पद की लालच सभी को होती है सो ये खूब सोच समझ के फैसला करते है .........
मेरा कैमरा बोला फैज़ अगर सभी नेता ऐसे हो गए तो इस देश का क्या होगा ,मैंने कहा घबरा मत हमारे देश की जनता इन कबूतरों को अच्छी तरह से पहचानती है वो इन्हें वोट देकर भारत माँ के सीने पर चोट नहीं लगायेंगे ...इन भीतरघातियों का अंत बहूत बुरा होता है दूसरा दल इन्हें अपने दल में उनके दल की योजनाओ से अवगत होने के लिए ही रखता है । तो सोच लो क्या तुम मुझे छोड़ के जाओगे ......वो बोला नहीं यार मै भीतरघाती नहीं हूँ समझे ............
तो अब फैसले की घडी नज़दीक आ गयीहै ।
Tuesday, March 31, 2009
आश्वासनों का दौर
आ गया है आश्वासनों का दौर ......
चारो तरफ़ नेताओं की भाग दौड आरम्भ हो चुकी है । सब अपने लिए वोट देने की अपीलें कर रहे है । हमारी भोली भली जनता इनके झूठे और लछेदार आश्वासनों में फसती नज़र आ रही है । यह बात कोई नई नही है .सब जानते है की ये नेताओं की पुरानी आदत है फ़िर भी उनकी बातो को मानकर उनके पीछे पीछे भागते है ।
नेता हर जगह अपने उद्बोधन में वही पुरानी बाते ही दोहराते है जैसे -इस बार अगर हम चुनाव में जीते तो बिजली के संकट से निजात दिलाएंगे ,हम सड़के हेमामालिनी के गाल जैसी बनवा देंगे ,पानी के समुचित व्यवस्था करेंगे ,गरीबों को काम देंगे ,बेरोजगारों को नौकरी दिलवाएंगे आदि-आदि ......
अगेर ये आश्वासन पुरे किए जाते तो आज हमारे देश में बेरोजगारों की इतनी लम्बी फौज न खड़ी होती .बाम्बे जैसी महानगरी में पानी की किल्लत न होती ,दुद्धी-लुम्बनी मार्ग में प्रीती जिंटा के गाल में पड़ने वाले दिएम्पल्स की तरह निशान न होता ,बनारस जैसे शहर में चौदह घंटे बिजली की कटौती न होती ...
तो फ़िर सोचिये क्या करना है अबकी बार ........क्या फ़िर इसी तरह उनके झूठे आश्वासनों का शिकार बनना है
सोच समझ के वोट करे .....क्योंकि यह देश आप का भी है
और वोट ज़रूर दे ..........ये आप का जन्मसिद्ध अधिकार है ..........
Sunday, March 29, 2009
बाप दादा देते थे इसलिए
आज का दिन बड़ा सुहाना था ,मेरे कैमरे ने उठते ही मुझसे कहा चलो मतदान पर अपने जवान पीढी का विचार जानते है । फ़िर क्या था पहुच गए हम दोनों एक कंप्यूटर सेण्टर पर वहां हमने समीर से पुछा की आप ग्रेजुएट है इस बार किसको वोट देंगे वो बोले देना किसको है पापा जहाँ देते है वही दे दूंगा । हमने उनके पापा से संपर्क किया तो वो भी बोले वही दूंगा जहा बाबूजी देते आए है ।
Sunday, March 22, 2009
राजनीतिक हलचल
आ गया चुनाव का मौसम सब दे रहे है अपनी राय,मै भी कुछ कहना चाहता हूँ लेकिन क्या कहूं सबने तो वही बाते घुमा फिरा के की है जैसे -हमारा नेता जनता के बीच का होना चाहिए ,वो जनता का रखवाला होना चाहिए ,हमारे सुख -दुःख का साथी होना चाहिए आदि-आदि इन सब विचारों से अलग मेरा मन "सलीम खान फरीद " की एक ग़ज़ल कहने का हो रहा है ---------------
यह मतदान है प्यारे
कैसा अजब विधान है प्यारे
हर कोई हैरान है प्यारे
तेरी मर्ज़ी नही चलेगी
जब तक ये मतदान है प्यारे
कोई उस तोते को मारे
जिसमे इनकी जान है प्यारे
अफसर के घर बूढी अम्मा ,
बेमतलब सामान है प्यारे
कोई ज्ञान नही है हमको
हमको इतना ज्ञान है प्यारे
करना उसका ध्यान जगत में -
जो भी अंतर्ध्यान है प्यारे
कबीरा का ढाई आखर ही
अब तक लहू-लूहान है प्यारे
Monday, March 2, 2009
क्या आज का मीडिया सिर्फ़ पोलिस की खबरों पर आधारित है
तो आप ही बताये क्या ये सही है