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Monday, June 28, 2010

"संकटमोचक के दूत बने संकट का पर्याय "


आज मै काफी दिन बाद बनारस लौटा दिल्ली गया हुआ था अपनी जॉब के सिलसिले से मेरे कैमरे ने कहा चल यार फैज़ छत पर सोते है फिर क्या था हम दोनों छत पर चले गए .............
सुबह मैंने आँख खोली तो खुली की खुली रह गयी एक बंदर के बच्चे ने मेरे पैर की अपने अपने मूह में रख रखा था और उसे चाट रहा था मेरी तो आवाज़ ही अटक गयी खैर वो मुझे जगता देख करे वहां से भाग गया .................
जी हाँ ये हल है हमारी कशी नगरी का जहाँ आज कल संकटमोचक के दूत संकट का पर्याय बन गए है ये अपनी मन मणि सब करते रहते है जब कहते है आप के घर में प्रवेश कर जाते है और फिर वहां उधम मचाते है ,आप बेबस है ये स्य्भा जब मोर्निंग वाल्क के लिए निकलते है तो फिर रस्ते में आने वाले किसी भी वास्तु को नहीं छोड़ते चाहे वो कपडा हो या फिर बर्तन ये उठा ले जायेंगे और दूर कही छोड़ देंगे ....
मैंने पता लगाने की कोशिश की तो इधर बीच अस्पतालों में बन्दर के द्वारा कटे गए या घायल किये गए मामलों में बढ़ोतरी हुई है। ये कभी भी आक्रामक हो जाते है जैसे इन्हें किसी ने ऐसा बना दिया हो।

आखिर मेनका गाँधी जी का इसपर क्या सोचना है , वो तो जन्तुओ पर कुछ होते ही चीलाने शुरू कर देती है ...अब बताये इन मासूम इंसानों का क्या जिन्हें बिना बात की सजा मिल रही है क्या किया जाये इन बंदरो का ........
हमें और जिला प्रशासन को भी इस बारे में सोचना होगा की बन्दर इतने क्रूर क्यों होगये है ..........