INDIA Blogger

Monday, December 7, 2009

" कूड़े में पाठशाला "

अरे कैमरे ये तस्वीरे कहाँ की है ???? ये है अपने यहाँ से ७० किलोमीटर दूर स्थित पूर्वांचल यूनिवर्सिटी की है , जो की एक बहुत बड़ी विद्या- संस्था है । ये बच्चे उसी के गलियारों में कूड़ा बीन रहे है। .....तुने गौर से नही देखा फैज़ इनकी पीठ पर बसते भी है, जो हमारी शिक्छा प्रणाली को मुह चिढा रहे है । ...काफी गम्भीर मुद्दा है ये की आज जिस जगह से लाखों बच्चे हर साल पढ़कर उचे-उचे पदों पर आसीन होते है उसी जगह ये प्रैम्रिय पाठशाला के बच्चे मैक्रोबायो लैब के पीछे से कचरा उठा रहे है । मेरे कैमरे ने इनसे बात करनी चाहि तो ये वहाँ से भाग गए लेकिन एक छात्रा जिसका नाम पूनम था उसने बताया की "हम यहाँ से प्लास्टिक का सामान बीन कर ले जाते है और कबाड़ी को बेचकर पैसे ले लेते है । " क्या हमारे गाँव की स्थति इतनी ख़राब है की वहां के पढने वाले छात्रों को अपनी जीवीका चलाने के लिए कूड़ा बीनना पड़ता है। मै आगे कुछ नही लिख सकता आप तस्वीरों में से इसकी भयावता को देख व समझ सकते है ................






































Saturday, December 5, 2009

"भारतीय एकता के सत्रह साल"

मेरा कैमरा आज मुझसे पूछ रहा था यार फैज़ आज ६ दिसम्बर है ना ,मैंने कहा हाँ आज कोई काला दिवस मनायेगा कोई शोर्य दिवस मनायेगा । तुम ठीक कहते हो फैज़ पर क्या किसी ने इस ध्यान दिया है की इन सत्रह सालों में हमारी एकता और अखंडता कहाँ तक पहुँची है.............
जी हाँ मेरा कैमरा सच कह रहा है क्या किसी ने इन सत्रह सालों में सोचा है की इससे हमारे देश की एकता और अखंडता को कितना नुक्सान पहुंचा है । सभी लोग चाहे वो समाज के ठेकेदार हो या फ़िर उज्वल वस्त्र धारद किए राजनेता जो सिर्फ़ इस दिन भाषद या फ़िर शोक सभा का आयोजन करते है । या फिर इन सत्रह सालों में आई गई केन्द्र या राज्य सरकार ने इस बारे में सोचा ? कभी किसी राजनेता ने इससेबात से हुए नुक्सान के बारे में कहा? नही न लेकिन हमारे ये "काठ के उल्लू" वो इससे पर भी हस्ते हुए कह देंगे की हम तो हर चुनावी भाषद में इससे बात को दोहराते है उत्तर प्रदेश में । अभी हाल ही में लिब्राहन आयोग की रिपोर्ट आई तब सभी तरफ़ चीख पुकार मच गई की हमने नही किया कुछ उन्हूने किया आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू हो गया यानि फ़िर एकता का हनन हुआ संसद जसी पवित्र जगह पर लोग आपस में लादे लेकिन क्या हुआ ,तभी आगई २६/११ की पहली बरसी सभी लोग उसपर बयान बाज़ी करने लगे और भूल गए फ़िर १९९२ के उस भारतीय एकता को डसने वाले दंश को जिसका दर्द आज तक यह भारत माँ नही भूली है । किसी ने सही लिखा था कुछ दिनों पहले अपने ब्लॉग में की लिब्रहान आयोग की जो आग एका-एक लगी थी वो २६/११ को ठंडी पड़ गई ....,....
तो आज ही सोचिये की कहाँ पहूची है हमारी एकता और अखंडता वरना बहुत देर हो जाएगी और ये नेता लोग जनता को ऐसे ही चलते रहेंगे ......

Tuesday, December 1, 2009

"क्या होगा उस महापुरुष के जाने के बाद"

मेरा कैमरा आज सुबह से टी.वी के आगे बैठा मैच देख रहा था और आंसू बहा रहा था मैंने पूछा क्या हुआ तो बोला मैसोच रहा था की क्या होगा जब क्रिकेट का यह महापुरूष संन्यास ले लेगा । सचिन रमेश तेंदुलकर या यूँ कहे की सचिन रिकार्ड तेंदुलकर तो कोई अतिश्योक्ति नही होगी ....मेरा कैमरा सत्य कह रहा है, आख़िर क्या होगा उनके बाद क्या हमारे देश में कोई और सचिन जन्म लेगा । भारत की क्रिकेट बोर्ड के आंतरिक द्वन्द को देखते हुए यह कहना मुश्किल है की उनके बाद क्या होगा ।

जिस बल्लेबाज़ को देखकर विपक्छी टीम के होश उड़ जाते थे कल कोउसकी गैरमौजूदगी में क्या हाल होगा टीम इंडिया का क्या किसी ने इस बारे में सोचा है , नही तो सोचिये क्योंकि अब ज्यादा दिन नही बचा है इस महापुरुष के संन्यास लेने में । आज जो व्यक्ति रिकार्डो के बिस्टर पर सोता जगता हो उसके संन्यास लेने के बाद उसके रिकार्डों का क़र्ज़ कौन वसूल करेगा कल यदि टीम इंडिया बिना इसके अपनी प्रसिद्धी नही साबित कर पायी तो यह हमारे लिया बहुत शर्मनाक होगा । सभी देश हमपर उंगलियाँ उठेयेंगे की हमारी टीम एक ही प्लेयर पर टिकी थी जिसके जाने के बाद सब तहस - नहस हो गया ।

कल को जब यह महान खिलाड़ी इस खेल को अलविदा कहेगा तो हमारे पास क्या होगा उसे देने के लिए तो आज ही से सोचना शुरू कर दीजिये दिलीप जी वरना बड़ी देर हो जाएगी .............


Sunday, November 29, 2009

"दलितों की कब्रगाह"

अरे यार फैज़ तुमने आज मुकुल श्रीवास्तव जी की बीबीसी पोस्ट पढ़ी क्या (मेरे कैमरे ने मुझसे पुछा )...नही यार कुछ ख़ास है क्या उसमे । हाँ ख़ास ही है हम जौनपुर के कितने करीब है पर नही जानते और उन्हूने इतनी दूर से पता लगा लिया । अरे क्या ये बातें गोल गोल घुमा रहा है सीधे सीधे बता बात क्या है ।
जानता है फैज़ जौनपुर जिले के कुल्हनामऊ गाँव में कई सदियों से दलितों को उनके मरने के बाद जलाने के बजाये गाडा जा रहा है । अगर मुकुल जी की जुबानी कहूं तो कुल्हनामऊ में ग़रीबी के कारण दलितों का अंतिम संस्कार हिन्दू रीति रिवाज़ों के अनुसार न कर उन्हें ज़मीन में दफ़नाया जाता है ।
मृतकों को दफ़नाने के लिए गाँव में ही एक कब्रिस्तान बना हुआ है । जहाँ उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री सुश्री मायावती जी दलितों के उत्थान के लिए एडी चोटी का ज़ोर लगा रही है । वही उनके एक सूबे में ग़रीबी के कारण दलितों का अंतिम संस्कार हिन्दू रीति रिवाज़ों के अनुसार न कर उन्हें ज़मीन में दफ़नाया जाता है । क्या गरीबी इतनी हावी है हमारे देश में की हम अपनी रीति रिवाजों के अनुसार अन्तिम संस्कार भी नही कर सकते । मुकुल जी के अनुसार गाँव के 80 वर्षीय बुज़ुर्ग मुरली बताते हैं कि अंग्रेजों के ज़माने से यहाँ मृतकों को दफ़नाया जाता रहा है। पहले यहाँ सिर्फ साधुओं को ही दफ़नाया जाता था लेकिन बाद में गाँव के ग़रीब लोग अपने संबंधियों को यहाँ दफ़नाने लग गए . अंतिम संस्कार के लिए शवों को दफ़ना देना एक सस्ता विकल्प है. मुरली के परिवार के सभी रिश्तेदार गाँव के इसी क़ब्रिस्तान में दफ़न हैं.वो बताते हैं कि एक मृतक के अंतिम संस्कार में कम से कम दो सौ किलोग्राम लकड़ी लगती है और बाकी के क्रिया कर्म के पैसे अलग। उनकी ख़ुद की तबीयत खराब है। पैसे की तंगी के कारण वे अपना इलाज़ नहीं करवा पा रहे हैं .
लेकिन मुरली यह कहना नहीं भूलते, "अगर अच्छा खाना मिले तो कोई ख़राब खाना नहीं खाएगा. अगर मेरा अंतिम संस्कार हिन्दू रीति रिवाज़ों के अनुसार हो तो मैं अपने आपको धन्य मानूँगा."
."कहाँ गया मुख्यमंत्री जी का वादा हम दलितों का उठान करेंगे क्या सिर्फ़ उन्हें आवास बनाकर देने से उनकी गरीबी दूर हो जाएगी । क्यों नही नरेगा को सुचारू रूप से लागो किया जाता की लूग अपने दह संस्कार के लिए लकडियाँ खरीद ले , क्यों नही समाज के ठेकेदार इस बात को समाज के सामने लाये फ़िर वही हुआ जो हमेशा होता है एक ज़िम्मेदार पत्रकार ने समाज के एक कटु सच को उजागर किया । दोस्तों ये मौका है इस vishaye पर charchaa न कर इस पर चिंतन करने का warna कल सिर्फ़ दलित ही नही...................

Monday, November 16, 2009

२२ जनवरी २००९ से १५ नवम्बर २००९ तक .......

ये क्या हुआ ......ये क्या हुआ ............ये क्या हुआ .........

अरे यार फैज़ आज क्या हुआ जो तुम ये गाना गा रहे हो (मेरे कैमरे ने मुझसे पूछा )॥अरे तुम को नही मालूम । तो सुनो राजनीति का बहुप्र्तिछित फैसला आज आ गया जिसका समाजवादी पार्टी के विपक्छी दल को बेसब्री से इंतज़ार था । .....अरे फैज़ कुछ विस्तार से बताओगे आख़िर हुआ क्या ??? अरे होना क्या था आज समाजवादी पार्टी के राष्ट्रिय महासचिव राजबीर सिंह ने पार्टी से इस्तीफा दे दिया । जिसके साथ ही मुलायम सिंह यादव और कल्याण सिंह की १० महीने की दोस्ती पर फुल स्टाप लग गया । अब ये दोनों एक मंच पर गलबहियाँ डाले नही नज़र आयेंगे । मुलायमसिंह ना तो कल्याण सिंह जिंदाबाद के नारे लगायेंगे और नाही कल्याण सिंह उन्हें आपने मित्र बताएँगे । अब तो आरोप प्रत्यारोप का सिलसिला शुरू होगा वो उन्हें दोषी कहेंगे और वो उन्हें ।ये बात किसी से नही छुपी की समाजवादी पार्टी के एक समुदाये विशेष के वोटो पर कल्याण सिंह के आने से विपरीत प्रभाव पड़ा और पार्टी की यह दशा हुई, जिसका सीधा उदाह्रद फिरोजाबाद उपचुनाव में मुलायम सिंह की पुत्रवधू की हार है साथ ही कही भी उसके प्रत्याशी का न जीत पाना ,और लोक सभा चुनावों में सिर्फ़ २३ सीते पाना वो भी सत्ता में रहते हुए । पर कल्याण सिंह जी तो अलग ही राग अलाप रहे है की अगर मे और मेरा बेटा न रहे होते तो उन्हें सिर्फ़ १४ सीटों से संतोष करना पड़ता ९ सीटों पर तो मैंने ही जीत दिलाई है । और तो और हम ख़ुद नही गए थे उनके यहाँ पर वो ख़ुद आए थे हमारे पास ......

मई तो यहाँ यही कहूँगा की "चूहे ने फसल ख़राब कर दी"क्योंकि समाजवादी पार्टी के वोट बैंक में सेंध तो लग ही चुकी है .....अब मुलायम सिंह जी क्या करेंगे.........

Monday, November 9, 2009

"भगत सिंह होने का मतलब"


"जालिम फलक ने लाख मिटने की फ़िक्र की ,हर दिल में अक्स रह गया तस्वीर रह गई "

"मै एलान करता हूँ की मै आतंकवादी नही हूँ ,और अपने क्रन्तिकारी जीवन के आरंभिक दिनों को छोड़कर शायद कभी नही था और मै मानता हूँ की उन तरीकों से हम कुछ हासिल नही कर सकते ".......भगत सिंह का ये एलान बहुत कम ही लोग जानते होंगे । निसंदेह भगत सिंह भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष के सर्वाधिक लोकप्रिय शहीदों में से एक है । हलाँकि अधिकतर उन्हें गोली चलने वाला युवा राष्ट्रवादी की रोमांटिक छवि से परे नही देख पाते थे । इसकी वजह शायद यह है की उनकी यही छवि औप्नीवेशक दौर के सरकारी दस्तावेजों में दर्ज की गई । लोग भगत सिंह को ऐसे शख्स के रूप में देखते थे , जो अपने हिंसात्मक कारनामो से ब्रिटिश शासन को आतंकित कर देता था । उनकी ज़बरदस्त हिम्मत ने उन्हें एक प्रतिमान बना दिया । भगत सिंह को आज भी प्यार और श्रधा से देखा जाता है ,लेकिन क्या हमें उनकी राजनीति और विचारों के बारे में पता है ? और क्या उनके हिंसा व आतंक में विश्वास के शुरूआती नज़रिए के बारे में पता है ?(जो मौजोदा आतंकवादी हिंसा से एकदम अलग चीज़ थी ) जिसे उन्हूने शीग्र ही एक ऐसे क्रन्तिकारी दृष्टिकोण में बदल लिया जो स्वाधीन भारत को एक धर्मनिरपेक्ष समाजवादी और समतावादी समाज में बदलने से वास्ता रखता था । भगत सिंह को जनता की तरफ़ से इस तरह का मुक्त समर्थन क्यों मिला ? जबकि उसके पास पहले से ही नायकों की कमी नही थी ? एस सवाल का जवाब देना आसान नही है । जब देश के सबसे बड़े नेताओं का तात्कालिक लक्छ्य स्वतंत्रता प्राप्ति था उस समय भगत सिंह जो बमुश्किल अपनी किशोरावस्था से बाहर आए थे ,उनके पास इस तात्कालिक लक्छ्य से परे देखने की दूर दृष्टि थी । उनका दृष्टिकोण एक वर्गविहीन समाज की स्थापना करना था और उनका अल्पकालिक जीवन इसी आदर्श को ही समर्पित रहा । भगत सिंह और उनके मित्र दो मूलभूत मुदों को लेकर सजग थे जो तात्कालिक राष्ट्रिय त्तथा अंतर्राष्ट्रीय परिपेछ्य में प्रासंगिक थे । पहला --- बढाती हुई धार्मिक व सांस्कृतिक वैमनस्यता और दूसरा समाजवादी आधार पर समाज का गठन । भगत सिंह और उनके कामरेड साथियों ने क्रांतिकारी पार्टी के प्रमुख लक्छ्यों में से एक बटोर समाजवाद लाने की ज़रुरत महसूस की ।सितम्बर १९२८ में दिल्ली स्थित फिरोज़ शाह कोटला के खण्डहरों में महत्वपुर्ण क्रांतिकारियों की बैठक में इस पर विचार विमर्श के बाद हिन्दुस्तान रिपब्लिक एसोसिएशन ( H R A ) में सोशलिसत शब्द जोड़कर HSRA बना दिया गया । भगत सिंह अपने साथियों को यह समझाने में सक्छ्म थे की भारत की मुक्ति सिर्फ़ राजनितिक नहीं बल्कि आर्थिक आज़ादी में है। समाजवाद के प्रति उनकी प्रतिबधता ८ अप्रैल १९२९ को उनके दुआरा असेम्बली में बम्ब फेंकने की कारवाही में भी प्रकट हुई । भगत सिंह दरअसल १९२० के दौर में सम्प्रदाइकता के बड़ते खतरे के प्रति सजग हुए । उसी dashak में RSS तबलीगी जमात का उदय हुआ । उन्होंने साम्प्रदायिकतावादी प्रतिस्पर्ध को बढावा देने की नीति पर सवाल किए । एक राजनितिक विचारक के रूप में वे तब परिपक्व हुए जब वो अपनी शहादत से पहले दो साल जेल में गुजारे । उनकी जेल में लिखी डायरी पोरी स्पष्टता से उनकी राजनितिक बनावट के विकास को दिखाती है । जेल में ही उन्होंने ने अपना विक्यात लिख " मे नास्तिक क्यों हूँ " लिखा । यह लिख तार्किकता की दृढ पछ्धार्ता के साथ अंधविश्वास का पुरजोर खंडन करता है । भगत सिंह मानते थे की धर्म शोषकों के हांथो का औजार है , जिसका इस्तेमाल वो जनता में इश्वर का भय बनाये रखकर उनका शोषद करने के लिए करते है । HSRA के नेताओं का वैज्ञानिक नज़रिया समये के साथ विकसित हुआ और उनमे से अधिकतर समाजवादी आदर्श या साम्यवाद के करीब आए । वे व्यक्तिगत करावाहियों के बजाये आन्दोलनों में भरोसा रखते थे । भगत सिंह उस संघर्ष को लेकर एकदम स्पष्ट राय रखते थे , उन्होंने अपने आखिरी दिनों में कहा था की ..........

" भारत में यह संघर्ष तब तक जारी रहेगाजब तक मुट्ठी भर शोषक आम जनता के श्रम का शोषद करते रहेंगे । यह कोई मायने नही रखता की ये शोषक खालिस ब्रिटिश या भारतीय दोनों सम्मिलीत रूप से है या विशुद्ध रूप से भारतीय है ।"

तो डालिए रौशनी उनके द्बारा सोचे गए शासन के वैकल्पिक ढांचे पर , जिसमे आतंक या हिंसा नही बल्कि सामजिक और आर्थिक न्याय सर्वोपरी होगा ।

Wednesday, October 21, 2009

"आख़िर क्यों बेच रहे है माँ "

अरे चचा बड़े परीशान दिखाई पड़ रहे है क्या हुआ , अरे क्या बताये बेटा मेरी गाय अब दूध नही देती । मुझे ही उसे अलबत दिन भर चारा खिलाना पड़ता है एक तो आमदनी कम दुसरे घर का खर्चा और उसपर ये बिना मसरफ की गाय क्या करून बड़ा परेशान हूँ सोचता हूँ इसे बेच कर दूसरी खरीद लूँ कम से कम उसका दूध बेचकर कुछ आमदनी तो हो जायेगी ,घर का खर्चा तो चलेगा वरना अब तो भूखे मरने की नौबत आ गई है । ..........

अरे फैज़ आज की ख़बर पढ़ी क्या ,कुछ लोगों को पुलिस ने गाऊ हत्या के जुर्म में पकड़ा है । अरे यार अब इनसे कौन कहे की अगर ये गौ हत्या करने वाले ये नही करेंगे तो और क्या करे जब एक भूख वसे मरता किसान अपनी बिसुक चुकी गए का मूल लगता है तो उसे अपने बच्चों की फ़िक्र होती हो जो भूख से तड़प रहे होते सभी धर्म ये मानते है की गौ की हत्या नही करनी चाहिए । लेकिन जब एक गरीब किसान इसे कसाई के हांथों में बेचकर अपने बच्चों के लिए भोजन खरीदता है। क्या कभी किसी ने इस बात के पीछे का मर्म जानने की कोशिश की क्यों आखिर रोज़ गौ हत्या में इजाफा हो रहा है। जब साहूकार किसी गरीब को अपने पैसे के लिए डराए गा तो वो बेचारा क्या करेगा अखीर बच्चा माँ के ही पास तो जाता है । गौ माता अपनी जान देकर अपने बच्चे की सहायता करती है ।

किंतु यहाँ सवाल उठता है की गाये बेचीं ही क्यों जाती है क्यों नही उनका समुचित रखरखाव होता । लोग अपनी जिम्मेदारियों से पीछे हटकर सिर्फ़ धर्म के नाम पर सवाल खड़े करते है की उसने ऐसा क्यों किया वगैरा -वगैरा ।आज सभी महानगरों में छुट्टा पशु की समस्या बनी है ,लेकिन कोई भी इस दिशा में समुचित कदम नही उठा रहा है । जब कोई गौ माता ट्रक या बस के नीचे आकर मर जाती है तब कोई भी संस्था सामने नही आती लोग भी अपनी नाक पर रुमाल रखकर रस्ते बदल लेते है ,तो फिर पाखण्ड का ये सिलसिला सिर्फ़ एक मुद्दे पर क्यों , क्या हमारा समाज इतना खोखला हो गया है । बस इतना ही कहना चाहूँगा की आख़िर ऎसी परिस्थति आए ही क्यों की गौ माता को बेचा जाए । अगर किसी की आस्था को मेरे लिख से दुःख pahunchaa हो तो मुझे chhama करें ।
लेकिन इस बात पर sochiye और bataiye ........

Thursday, October 8, 2009

"ये क्या है ?"


आज उस बूढे ने आपनी जिंदगी भर में ऐसा अपमान शायद आज पहली बार सहा था । वह कोई बहुत अमीर तो नही था लेकिन mehnat और स्वाभिमान की अटूट पूँजी उसके पास थी । आँखे मारे थकान के बोझिल हो गई थी । बंद होती आँखों में गुज़रा ज़माना याद आने लगा जब वह अपने बेटे को कंधे पर बिठाकर गाँव के मेले घुमाया करता था । छोटे से बच्चे को यदि पेड़ की डालपर बैठी चिडिया दिख जाती वह wah अपने पिता से पूछता था की "पिताजी वह क्या है ?"वह बताता "बेटा चिडिया है ।" वह बार बार पूछता और वह भी बार-बार मुस्कुरा कर बताता की चिडिया है । धीरे धीरे समय ने करवट ली बेटा पढ़ लिख कर अफसर बन गया और शहर में बस गया । ......हिम्मत अब जवाब देने लगी थी ,न चाहते हुए भी उसे अपने बेटे के पास शहर जाना पडा । उसे देखते ही बहू ने पैर छूकर सौभाग्यवती होने का आशीष पाना तो दूर ,बड़ा बुरा सा मुह ,बुरा तो उसे भी बहुत लगा पर ज़माने का रंग सोचकर शांत रहा ।

पर आज तो गज़ब हो गया , बेटे के दोस्तों की पार्टी चल रही थी और उसने केवल इतना ही तो पूछा था की "बेटे यह क्या है ? " और इसी "क्या है " के कारण बेटे और बहू ने उसे दरवाज़े के बाहर का रास्ता दिखला दिया .......


अब जब वो बेघर था तो साड़ी इन्द्रियां इस्तीफा दे बैठी थी और उसकी चीर्निद्रा को फुटपाथ ने अपने आँचल में सहर्ष samett लिया .......मे पूछता हूँ इस समाज से "आख़िर ये क्या है ?"

Wednesday, September 16, 2009

ये क्या हो रहा है ......

उफ़ कैसा मंज़र था लखनऊ के उस इंजीनियरिंग कॉलेज का चारों तरफ़ भय का माहोल था सभी लड़कियां पूनम की मौत के बाद सहमी हुई थी । कोई भी कुछ बताने को तैयार नही था । जैसे लड़कियों को कॉलेज प्रशासन ने ने कुछ भी बताने को मना किया हो ......ये सब हुआ रेगींग के चलते जिसके लिए सविधान में एक भरी भरकम क़ानून बनाया गया है । लेकिन वो बड़े घर के लड़कों के लिए नही है .....आप सोच रहे होंगे क्यों तो सुनिए जो लड़के अभी रेगींग के मामले में पकड़े गए थे बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में उन्हें छोड़ दिया गया । क्यों जानते है ,उनके वकीलों की दलील पर एक नज़र डालिए ...."ये सभी छात्र सभ्य घर के है तथा जेल में रहने से उनके साफ सुथरे मन पर भारी असर होगा " और कोर्ट ने सभी को ज़मानत दे दी । अब कौन समझाए इन्हे की अगर इनके व्यवहार पर जेल में रहने से असर पड़ेगा तो फिर बाहर रहते हुए भी वो कहाँ कोई अच्छा काम कर रहे है । .....

अब आप ही बताइए क्या ये ठीक है कल को वकील साहब का लड़का या लड़की रेगींग का शीकर होंगे तो वो क्या दलील देंगे ....कल जो कुछ भी हुआ उसके लिए हम आप भी ज़ीम्मेदार है। क्या ये हमारा कर्तव्य नही है सोचिये.....

Sunday, September 13, 2009

अब तेंदुओं की बारी .............

क्या भा फैज़ कहाँ थे आज कल कोई नई पोस्ट नही आ रही थी तुम्हारी कहाँ थे तुम ? अरे कही नही यार रमजान चल रहा है न मौका नही मिल रहा था । जनता है फैज़ आज कल लोग शेर के साथ साथ तेंदुओं को भी नही छोड़ रहे है । वन्यजीव पर काम कर रही गै़र सरकारी संस्था 'वाइल्डलाइफ़ प्रोटेक्शन सोसाइटी आफ़ इंडिया' के अनुसार इस साल के शुरुआती दो महीनों में ७२ तेंदुए मारे जा चुके हैं । वाइल्ड लाइफ़ प्रोटेक्शन ऑफ़ इंडिया के मुताबिक़ तेंदुओं की सबसे ज़्यादा मौत झारखंड राज्य में हुई है । यहाँ २१ तेंदुए मारे जा चुके हैं। झारखंड एक ऐसा राज्य है जहाँ तेंदुओं की संख्या सबसे ज़्यादा है । कर्नाटक में ११ तेंदुए मारे जा चुके हैं जबकि हिमाचल प्रदेश में नौ तेंदुए मारे गए हैं। हालांकि ये संस्था इन मौतों का अलग अलग कारण बताती है ।


वाइल्ड लाइफ़ प्रोटेक्शन सोसाइटी आफ़ इंडिया की निदेशक बलिडा बताती हैं, " तेंदुओं को ज़हर दिया जाना, सड़क दुर्घटना, बदले की भावना के तहत कार्रवाई, शिकार, बिजली का करंट और जानवरों और मनुष्य के बीच संघर्ष इनकी मौत के मुख्य कारण हैं।" बलिडा तेंदुओं की घटती संख्या के लिए ग़ैरक़ानूनी शिकार को मुख्य कारण नहीं मानती हैं ।
पर्वतीय क्षेत्रों में रह रहे लोग तेंदुओं को नहीं चाहते क्योंकि लोग उनसे डरते हैं। तेंदुए गांव मे शिकार की तलाश में आते हैं क्योंकि जंगल में उन्हें अपना शिकार नहीं मिलता ।
रिपोर्ट के मुताबिक़ इस महीने की शुरुआत में तेंदुओं की साढे़ चार किलो हड्डियां और ३३ खालें बरामद की गईं और ३९ तेंदुए अलग अलग परिस्थितियो में मृत पाये गए.
शिकार के मामलों पर रिपोर्ट बताती है कि वर्ष २००८ में १६१ तेंदुओं का शिकार किया गया और १९९९ से २००८ तक ३१८९ चीतों का शिकार किया गया ।

भारत में वन्य जीवों का शिकार करना अवैध है फिर भी रोज़ यहाँ कई वन्य जीवों का शिकार होता जोकि एक भयंकर समस्या है । यहाँ वन्य जीवों का व्यापार अवैध हैं । तेंदुए के अंगों का इस्तेमाल दवाओं के लिए किया जाता है जिनकी की़मत बहुत ज़्यादा होती है ।
इनकी हड्डियों को बाघों की हड्डियों के विकल्प के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है । साथ ही इनकी खोपडी़ और पंजों की भी मांग काफी़ होती है । चीन और दक्षिण पूर्व एशियाई देश इनके अवैध व्यापार के बडे़ केंद्र हैं । चीन ही नहीं अमरीका, जापान और जर्मनी तक अवैध व्यापार हो रहा है । नशीली दवाओं और हथियारों के बाद वन्य जीवों की तस्करी दुनिया का तीसरा बडा़ अवैध व्यापार है ।


आंकड़ों पर नज़र डालें तो २००८ में ११ हज़ार चीते थे। बाघों की बात की जाए तो इस दौरान लगभग १४११ बाघ जीवित थे । वन्य जीव विशेषज्ञों के अनुसार तेंदुओं की हत्या की दर बाघों से कहीं ज़्यादा है। बाघों की घटती संख्या को स्वीकारते हुए सरकार ने आयोग का गठन भी किया था। लेकिन तेंदुओं की घटती संख्या पर अभी तक सरकार का ध्यान नहीं गया है । वन्यजीव पर काम करने वाले जानकारों का कहना है कि वे केवल समस्या को उठा सकते हैं लेकिन कार्रवाई की पहल तो सरकार को करनी होगी क्योंकि ये सवाल जंगल, जानवर और मनुष्य के बीच पैदा हुई खाई को पाटने का भी है।

तो अब तुम बताओ फैज़ क्या होगा समाज का जब शेर और तेंदुओं को इंसान नही बख्श रहा है तो कल क्या वो अपने जैसे इंसानों के अपने फायदे की स्थिति में बक्शेगा .....सोचिये .........

Thursday, August 20, 2009

"आस्थ का सिक्योरिटी चेक"


आप सोचेंगे मैंने इस पोस्ट का नाम ये क्यों दिया ,तो सुनिए मुद्दा शिर्डी के साईं बाबा से जुडा हुआ । काफी दिनों से चल रहे वीवाद का आज निस्तारद तो हो गया मगर एक नया मुद्दा ये है की यदि बाबा की चाँदीकी चरण पादुका अमेरिका ले जाई गई तो क्या उसे बिना सिक्योरिटी चेक के वहां जाने दिया जाएगा । .....सभी इस बात से वाकिफ है की शिर्डी के साईं बाबा के भक्त इस बात को कत्तई बर्दाश्त नही करेंगे क्योंकि शिर्डी के साईं बाबा में सभी धर्म के लोगों की आस्था है । भारत जैसे धर्म प्रधान देश में आस्थ से खिलवाड़ महंगा पड़ सकता है । कल को कोई भक्त ये कह सकता है की देश में स्वैन फ्लू इसी वजहा से फैला यानी आस्था के कंधो पर पैर रखकर अंधविश्वास उंचा हो जाएगा । ...........


क्या कोई भी व्यक्ति इस बात की गारंटी ले सकता है की उनकी चरण पादुका को सिक्योरिटी चेक से नही गुज़रना होगा । .....यह तो हम सोच भी नही सकते क्यों ...क्योंकि जब हमारे ही देश में विदेशी कंपनियाँ हमरे पूर्व राष्ट्रपति को चेक कर सकती है तो फिर वो तो .........

फिर जो अभी हाल ही में शारूख खान के साथ हुआ ,अमेरिका में उसका तो क्या कहना । मै तो प्रबुध्जानो को यही राय देना चाहूँगा की कुछ भी करे लेकिन आस्थ को चोट पहुंचाए बिना । वरना यह छोटा सा मुद्दा बहुत विकराल रूप अपना कर सकता है ........

Thursday, August 6, 2009

"सर कटाने चला था वतन के लिए"

आज जब मै ऑफिस से घर पहुँचा तो मेरा कैमरा मुझसे कहने लगा फैज़ तुने अपना कुरता -पैजामा धुलवा कर प्रेस करवाया की नही ,मैंने पुछा क्यों तो वो बोला अरे पगले १५ अगस्त आ रही है । तुझे भी तो कही झंडा फहराने के लीये जाना होगा ......नही यार कल मेरी कालोनी वालों ने मुझे बुलाया था लकिन मैंने कहा की इस काम के असली हकदार हमारे कालोनी के शर्मा जी है जिनके बेटे ने इस देश की रक्छा करते हुए इस पर अपने प्राण लुटा दिए थे ,कारगिल के cमें .......वह फैज़ तू तो बड़ा समझदार निकला पर हमारे देश के नेताओं को क्या हुआ है जो झंडा फहराने के लिए इतने उतावले रहते है ,उन्हें देश के वो वीर सपूत और उनके परिवार वाले नही याद आते । क्या ? लालकिले की प्राचीर पर सिर्फ़ माननीय प्रधानमंत्री जी का ही हक है झंडा फहराने का , मै जनता हूँ मेरी इस बात से लोग कहेंगे की अरे प्रधान मंत्री ही तो तय करता है की क्या कब और कैसे होगा ताकि देश सही रूप से प्रगति के पथ पर आगे चल सके , लेकिन क्या कभी कोई प्रधानमंत्रीयुद्घ में मोर्चा सँभालने गया है या फिर उनके बच्चे याफिर कोई नेता ही ...नही न तो फिर ...............

अरे फैज़ इतना परेशान मत हो तेरी इस बात को सहमती देती हुई एक कविता किसी कवि ने पहले ही लिख दी है ,तुझे सुनाता हूँ ..............

सर कटाने चला था वतन के लिए ,कत्ल होने से पहले ही आ गया होश में ।

कोसने फिर लगा दिल को नादान है तू , पगले ये था क्या करने चला जोश में ।

मांग बीबी की सूनी पड़ जायेगी , कोख माँ की लालन से उजड़ जायेगी ।

बाजू भाई के कमज़ोर पड़ जायेंगे , साँस सरहद पे तेरी उखड जायेगी ।

पूछता हूँ तुम्ही से बता तू ऐ दिल, चाँद वर्षों पहले हुआ था कारगिल ।

राखी के दिन बहन को रुलाई मिली , .......................

जाकर पूछो ज़रा तुम शमशानों से , दश पर मर मिटे उन दीवानों से ।

तनहा उनपर थी दस-दस की जब टोलियाँ , कौन नेता गया था बचने वहां ।

शान जबकि तिरंगे की वीरों से है , कायम चमक बलिदानी हीरों से है ।

जान सरहद पर नेता गवाते नही , लाल भी इनके लड़ने को जाते नही ।

फिर तिरंगा ये नेता फहराते है क्यों , क्यों वतन के सीपाही फहराते नही .........................

Thursday, July 30, 2009

जंगल का राजा कौन "आदमी या शेर"

उफ्फ्फ कैसा डरावना मंज़र रहा होगा वो जब वो लोग शेर का शिकार किया हुआ मांस उसके मुँह से छीन ले गए । ये सब बातें मेरा कैमरा मुझसे बता रहा था । उसने मुझसे पूछ लिया की आख़िर ये मनुष्य कितना बड़ा जानवर है की वो जंगल के राजा शेर का भी भोजन छीन ले रहा है । अब आप कहेंगे की मेरे कैमरे का दिमाग ख़राब हो गया है ,लेकिन ये सच है । बी.बी.सीकी ताज़ा जारी रिपोर्ट के अनुसार भूख से बेहाल कैमरून के गांवों में रहने वाले लोग इन दिनों जंगल के राजा के घर में सेंध लगाने से भी नहीं घबरा रहे ।.........


शेर ने शिकार मारा और उससे निकलते गर्म ख़ून पर ज़ुबान फिराना शुरू ही किया कि गांववाले पहुंचे, किसी तरकीब से उसे वहां से भगाया और मांस लेकर रफ़ूचक्कर । अंग्रेज़ी में इसे क्लेप्टोपैरासाइटिज़्म कहते हैं, जिसमें जंगल के बड़े शिकारी यानि शेर, लकड़बग्घा, चीता एक दूसरे का मारा हुआ शिकार चुरा लेते हैं । लेकिन अफ़्रीका के जंगलों में काम कर रहे पर्यावरणविदों का कहना है कि अब इंसान भी इस चोरी में शामिल हो गए हैं और ये धड़ल्ले से हो रहा है । chinta की बात ये है कि धीरे धीरे ये आदत फैलती जा रही है और कैमरून में घटते हुए शेरों की संख्या के लिए ये ख़तरे की बात है ।


यही नही शेर से उसका शिकार चुराते हुए स्थानीय गांववालों की रिपोर्ट अफ़्रीकन जरनल ऑफ़ इकोलॉजी में भी प्रकाशित हुई है । इसमे एक शेर और शेरनी पर कुछ समय से नज़र रख रहे वैज्ञानिकों ने पाया कि उन्होंने कुछ ही देर पहले एक बड़े से हिरण का शिकार किया था और उसे खा रहे थे जब उन्हें वैज्ञानिकों के वहां होने का एहसास हुआ । शेर और शेरनी दोनों ही पलक झपकते ही झाड़ियों में छिप गए । वैज्ञानिक वहां से हट गए लेकिन कुछ घंटों बाद जब लौटे तो देखा कि वहां कुछ स्थानीय गांववाले जुटे हुए थे और बाहरवालों को देखकर वो भी छिप गए । वैज्ञानिकों ने पास जाकर देखा तो पता चला कि गांववालों ने चाकू से सारा मांस निकाल लिया था, वहीं से पत्ते लेकर उसे पैक भी कर लिया था और बिचारे जंगल के राजा और रानी के लिए छोड़ा था बस सर, खुर और बची खुची अंतड़ियां । उन्हें दूसरा ऐसा ही नज़ारा दिखा कैमरून के वाज़ा राष्ट्रीय पार्क के अंदर जहां शेर को भगाकर उसके मारे हुए हिरण पर क़ब्ज़ा कर लिया गया ।वैज्ञानिकों का कहना है कि बोरोरो जनजाति के लोग अक्सर ये करते हैं और आमतौर पर शेरों को भगाने के लिए लाठियों और आग का सहारा लिया जाता है ।


शोधकर्ताओं का कहना है कि इसका शेरों की संख्या पर गंभीर असर हो सकता है क्योंकि एक शिकार को मारने में शेरों को ख़ासी मेहनत करनी होती है और उसके बाद भी अगर उन्हें भूखा रहना पड़े तो ज़ाहिर है उनकी ताक़त कम होगी । पिछले कुछ सालों के सर्वेक्षणों में इन जंगलों में शेरों की संख्या घटती नज़र आ रही है और एक अनुमान है कि यहां हर साल छह शेर ग़ैरक़ानूनी तौर पर शिकार किए जाते हैं,और अगर उनका निवाला भी उनके मुंह से छिन रहा है तो फिर भगवान ही बचाए जंगल के सम्राट को ..................!!!!!!!

Monday, July 27, 2009

"जय हो"


कल मै बहुत आहत था , मैंने ये कभी नही सोचा था की हमारे देश में हमारे शहीदों के साथ ये होगा । आप सोचेंगे आख़िर हुआ क्या तो सुनिए ॥कल मै जब सुबह टी। वी देख रहा था तभी मेरे घर के बगल के एक बच्ची ने मुझसे एक सवाल पूछा की अंकल ये कारगिल क्या है सुबह से दिखा रहे है टी.वी पर .........तभी से मै अपने आप को कोस रहा हूँ की क्या होगया है हमारे देश के रखवालों को , कैसी हो गई है हमारी शिछा की हम १० साल पुरानी घटना को अपनी आने वाली पीढी की दिमाग में नही डाल पा रहे है । ...समाज के वो लोग कहाँ मर रहे जो समाज उत्थान का बीडा उठाये हुए है । इनको भी आज का दिन भी बस एक पार्टी सम्मेलन की तरह दिखाई देता है बस लंबा लेक्चर दिया , और वही रता रटाया शेर पढ़ दिया की ....शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले ,वतन पर मरने वालों का यही बाकी निशा होगा । लेकिन उन्हूने सोच है की कल को आने वाली पीढी को क्या बताएँगे .....,..क्यों आज तक किसी कारगिल शहीद की वीरगाथा किसी माद्यमिक बोर्ड की किताब में नही छापी क्या इसके पीछे हमारा सिस्टम दोषी नही है । .......क्यों फिर ये कहा जाता है की शहीदों के परिजन बेवजह हो-हल्ला मचाते है । जब आप उनके उस बेटे को सिर्फ़ एक दिन याद करेंगे जिसने आप की जिंदगी के कितने साल बचाए तो उनका मन आहत नही होगा । ....सभी राज्य सरकारों को चाहिए की वो अपने यहाँ क्लास १ से अपने राज्य के अभी तक के सभी शहीदों की वीरगाथा उनकी जीवनी के साथ छापे और चलाये । तब जाकर उन शहीदों को सही श्राधांजलि मिलेगी ।


क्या हम भी उनके लिए कुछ कर सकते है ? यदि हाँ तो आइये आज एक संकल्प करते है की हम उन देश के जवानो की वीरता के किस्से इस तरह से आम करेंगे की बच्चा बच्चा उनकी वीरता का गुडगान करेगा .............

Sunday, July 19, 2009

"पढ़-पढ़कर बालक हुए लछ्य हीन बदहाल, है व्यवसाय न नौकरी ,जीवन है जंजाल"


कल मेरा कैमरा अस्पताल से लौट आया मैंने उसे एक पत्रिका दी ताकि वो बोर न हो ,थोडी ही व्यापार बाद वो मेरे पास आया और मुझे कुछ पढ़ कर सुनाया । वही मै आप को पढ़ना चाहता हूँ । शायद आप को सतीश वर्मा जी का यहाँ रोचक लेख पसंद आएगा ................

जीवन में अब रस नही ,नीरस है परिवार, माता-पिता सर्विस करें , शिशूग्रह है व्यपार ।

स्नेह कहाँ ममता कहाँ 'कीटी-पार्टी' बीच ,बच्चे आया पालती जो धन रही उलीच ।

अठमासे शिशु को नही मम्मी पास सुलाए ,बिगडे फिगर न दूध भी डिब्बा बंद पिलाये ।

माता अब मम्मी बनी पिता बन गए अब डैड , एक बरस का शिशु रहे सोता सिंगल बैड ।

इकसठ में था लव हुआ बासठ हुआ तलाक़ , हुए रास्ते अलग अलग तो बच्चा हुआ तलाक ।

शिछा बिकती है यहअन गली मुहल्ले गाँव , शिशु के पुस्तक भार से सीधे पड़े न पाँव ।

विद्यालय ये है नही क्रूर विद्यालय मात्र ,दुर्वट पुस्तक भार को सहते कोमल गात्र ।

शिछालय तो बन गया हितकारी व्यापार , अल्प्वित शिछ्क सुलभ शिशु की मारामार ।

अब नही रहे वो गुरु -गुरु रहे शिश्यधन छीन , कैसे विद्या पाएंगे श्रधा हिन् मलीन ।

बीस दुधमुहे चल दिए चढ़ के शिछा माहि , भारी बसता लादकर सब विद्यालय जाहि ।

मिले चार सो पे जिसे वह मिस्ट्रेस कहलाये , मैनेजर की नौकरी जो हर शाम बजाये ।

ड्रेस-बेल्ट,कापी-कलम, बिल्ला-बूट-किताब ,विद्यालय से ही मिले पुरा रखे हिसाब ।

पढ़-पढ़कर बालक हुए लछ्य हीन बदहाल, है व्यवसाय न नौकरी ,जीवन है जंजाल ।

उलटा और डरावना पढ़ा रहे इतीहास ,जैसे मुर्दा देश यह पीटने का अभ्यास ।

भवन-तात्पति नही , शिछ्क खडिया नही, बालाहार बाज़ार में ,टीचर निज ग्रह माही ।

चुराहे पर देश है लुटा पित्ता बदहाल , पग-पग मदिराल्ये खुले ,जनता हुई निहाल ।

और अंत में एक लाइन मेरी भी जोड़ लीजिये की.........

नित्य सिकुड़ता जा रहा भारत का भूगोल , तनिक न चिंता देश की नेता गोल-मटोल ।


Sunday, July 5, 2009

"मुर्दा कब्र के बाहर आया"

सभी कहते है की भारत देश का क़ानून सबसे अच्छा है । लेकिन मैकहता हूँ की यहाँ का कानून सबसे ख़राब है । आप सोच रेहे होंगे मैंने ऐसा क्यों कहा तो सुनिए .........ये वही क़ानून है न जिसे कभी पूजा जाता था कहा जाता है की या सभी नागरिकों को सामान रूप से जीने का हक देता है लकिन अब तो कोर्ट-कचहरियाँ गडे मुर्दे भी उखाड़ने से गुरेज़ नही करती । ऐसे आदेशों की बयार सी आगई है जिनमे लाश को कब्र से बहर निकल कर उनका दुबारा पोस्टमार्टम किया गया । आख़िर क्या वजह है की डॉक्टर सही से पोस्टमार्टम रीपोर्ट नही बनते और फ़ैसला सुननाने में दिकतें आती है । ...........


आप ही बताये यदि कोई हिन्दू लड़की या व्यक्ति मारा जाता jammu में तो आज हाईकोर्ट उसका दुबारा पोस्टमार्टम कराने का आदेश कैसे देती । क्यों नही ऐसे डॉक्टरों को दंड मिलता जो ग़लत या भ्रामक रीपोर्ट बनते है। कभी आप ने सोचा है की क्या बीतती है उनके परिजनों पर जब उनकी लाश दुबारा कब्र से बाहर निकाली जाती है। ....अभी हाल ही में हमारे बनारस में भीएक दहेज़ प्रताडित महिला का शव कब्र से बाहर निकला गया जिसको लेकर कई दिनों तक चर्चो का बाज़ार गर्म रहा फिर सभी खामोश हो गए । आख़िर कब तक खामोश रहेगा हमारा समाज । क्या समाज के ठेके दार आज भी अपने हित के लिए खामोश रहेंगे ? क्या हाईकोर्ट इस पर भी कोई प्रावधान बनाएगी या फिर ऐसे ही लोगों की भावनाओं को चोट पहुचती रहेगी । क्या उसे सिर्फ़ समलैंगिक लोगों के हित का ध्यान आया है या फ़िर समाज की इस घटना पर भी कोई क़ानून बनने का ख्याल आया है । उसे चाहिए की कोई ऐसा क़ानून बनाये की आतंरिक परीछाद रिपोर्ट में जो बातें हो वो एक बार में सही लिखी गई हो नाकि ग़लत , ताकि किसी भी महिला या पुरूष को मरने के बाद न सताया जाए। ..........

आप ही बताये क्या मे ग़लत कह रहा हूँ क्या किसी धर्म में ऐसा लिखा गया है की मरने के बाद व्यक्ति को यातनाए दी जाए वो भी बार बार । सोचिये और मुझे बताइए मे इंतज़ार कर रहा हूँ उन माँ-बाप की तरफ़ से जिन की बेटियों और लड़कों के साथ ऐसा हुआ ..............

Thursday, July 2, 2009

"समलैंगिक फ़ैसला"

आज मेरा कैमरा अस्पताल में भरती है ,कल रात से उसकी तबियत ख़राब है । मुझसे डॉक्टर ने पुछा की क्या हुआ है इसे तो मै बता भी नही पाया । पर आप से बताना चाहता हूँ .............

कल जब सुप्रीम कोर्ट का समलैंगिक फ़ैसला आया तभी से ये बहकी बहकी बातें कर रहा था । आखिर रात होते होते इसे तेज़ बुखार चढ़ गया । ये नींद में बडबडा रहा था की मुझे भी एक मेरी तरह का कैमरा लाके दो । मै बहुत परेशान हो गया और उसे यहाँ ले आया ।

खैर ये तो मेरा कैमरा था लकिन आप क्या कहते है इस समलैंगिक सरकार के इस समलैंगिक फैसले के बारे में । क्या प्रकृति के नियमो के विरूद्व जाना सही है । क्या संस्कृति प्रधान देश में ये सब करना उचित है । जिस तरीके से हाईकोर्ट ने समलैंगिक सबंधों को अपराध करार देने वाले १४९ वर्ष पुराने कानूनों को बुनियादी अधिकारों का उलंघन बताया है, क्या वो सही है। हाईकोर्ट की न्यायाधीश ऐ.पी.शाह और एस .मुरलीधर की पीठ ने कहा की १४९ वर्ष पुर्व जारी क़ानून ३७७ सविधान की धारा १४,१५,१९ वा २१ का उलंघन करती है जिसमे मानवाधिकार की बात की गई है । ..........

angrezon ने जो १४९ वर्ष पहले क़ानून बनाया था शायद वो सही था , सन १९४१ में उर्दू लेखिका इस्मत चुग़ताई को अपनी कहानी "लिहाफ"के लिए सज़ा भुगतनी पड़ी थी जो इसी समलैंगिक रिश्तों पर आधारित थी । क्या कभी किसी ने ये सुना है की किसी जानवर ने भी ऐसा किया है ...जब हमारे इस पवत्र संस्कृति वाले देश में जानवर भी इसे पाप समझते है तो फिर हम आप कौन होते है प्रक्रति के नियमो से छेड़ छाड़ करने वाले । कुछ लोगों ने खजुराहो की मूर्तियों की बात कही है की जो समलैंगिकता का विरूद्व करते है उन्हें खजुराहो की मूर्तियों देखनी चाहिये । उनसे कोई ये पूछे की तब गुरू को भगवान् का दर्जा मिलता था अब क्यों नही मिलता , तब नारी देवी सामान थी अब क्यों नही , तब लोग रजा और राज्य के प्रति समर्पित थे अब क्यों नही , तब राजा प्रजा का बराबर से दयां रखता था कोई उसके लिए अलग नही था । तो सिर्फ़ इसी बात के लिए क्यों याद आई खजुराहो की मूर्तियाँ ।

वही कुछ समय पहले जिस सरकार ने इस फैसले पर असहमति दिखाई थी वही इसके साथ खड़ी दिखी , तब उसने कहा था की इससे ऐड्स के के मरीजों में वृद्धि होगी ,साथ ही उसने जाम्बिया का आकडा भी रखा था जहा ३३ प्रतिशत समलैंगिक ऐड्स का शिकार है । ऐड्स संघ ने कहा है की भारत में समलैंगिकता पर से कानूनी रोक हट जाने से सबसे अधिक फायदा ऐड्स के छेत्र में होगा लोग अब इस पर खुल के बात करेंगे । अब उनसे कौन कहे की हमारे यहं परिवार नियोजन की इतनी बड़ी समस्या है उस पर तो कोई खुल के बात नही करता तो इस पर क्या करेंगे । चाहे जो हो मै तो यही कहूँगा की हमें कोई हक नही है हम प्रकृति के नियमों के साथ खिलवाड़ करे । चलिए डाक्टर साहब आरहे है मै अपने कैमरे की तबियत पूछ लूँ और आप इस विषय पर चिंतन कीजिए और मुझे बताइए ....................

Wednesday, June 24, 2009

"बोरवेल अंकल का साछात्कार"

कल एक और बच्ची "बोरवेल अंकल" के मुँह में जा गिरी । फ़िर क्या था हाँथ पाँव फूल गए प्रशासन के सभी भाग दौड़ करने लगे । एक बार फ़िर खबरिया चैनलों को २४ घंटे दर्शकों को बांधने का मौका मिल गया। मेरा कैमरा भी निकल गया इस घटना क्रम को करीब से देखने ,और जब वो लौटा तो उसके पास ऐसा कुछ था जो शायद ही किसी मीडिया के रिपोर्टर के पास हो । वो था उस बोरवेल और उसमे गिरे तमाम लोगों का साछात्कर ............जिसे मै आज यहाँ पेश कर रहा हूँ । आशा है आप को पसंद आएगा.........



पहला प्रश्न बोरवेल अंकल आप से .....ये बताइए की आप का जन्म कैसे होता है ? उत्तर -अजी होना कैसे है बस सरकार से ठेका होता है और ठेकेदार लोग हमें बड़ी बड़ी मशीनों के द्वारा खुदवाते है । जिससे उस जगह पर पानी की कमी पुरी की जा सके । बस इस तरह हमारा जनम होता है ।



प्रश्न-२- ये बताइए आप की प्रविती खुले रहने की हमेशा खुले रहने की है या बस युही मज़ा लेने के लिए ? उत्तर - देखिये मेरा मुँह न खोल्वाइये । हम कोई शौक नही रोज़-रोज़ बच्चों को गोद लेने का जो मुँह खोल के बैठे रहे की प्रिंस आए ,ज्योति आए या फ़िर अंजू । वो तो ठेकेदारों और सरकार की मिली भगत होती है ।जितने पैसे सरकार बोरवेल खुदवाने के देती है उतने ही उसे पाटने के भी ,लकिन ये लोग पैसे खा जाते है । जब कोई हमारे अन्दर गिर जाता है तो फिर सरकार उसे पाटने का आदेश देती है फिर से टेंडर होता है फिर से पैसे की दलाली होती है ।



आइये अब बात करते है भारत के बोरवेल में गिरे सबसे पहले बच्चे प्रिन्स की जिसे देश ही नही पूरी दुनिया ने ५४ घंटे तक लगातार देखा । उस दिन तारीख थी , वो मार्च की २१ तारीख थी जब एक तरफ़ मिलेट्री उसे बहार निकलने के लिए जी - जान लगाये थी वही भारत का एक अमूल्य संगीत रत्न गहरी नीद में सो चुका था जी हाँ भारत रत्न उस्ताद बिस्मिल्ला खा .......जिन्हें ३९ जी.टी.सी। गोरखा रेजिमेंट के जवानों ने राष्ट्रिय सम्मान के साथ सुपुर्दे खाक किया ।



प्रश्न-३-तो प्रिन्स जी ये बताइए उस दिन क्या हुआ था जब आप बोरवेल में गिरे थे ?
उत्तर- मै तब बहुत छोटा था मुझे कुछ याद नही लकिन बाबा बताते है की मै खेलता खेलता वहां पहुच था और फ़िर जो हुआ उसे पुरी दुनिया ने देखा । क्या हुआ कैसे बचा और बाकी सब । हाँ मै ये कह सकता हूँ की मेरे गिरने के बाद बोरवेल में गिरने का ट्रेड सा आगया है ।


प्रश्न-४-अगला प्रश्न अंजू जी आप से ये बताइए कैसा लग रहा है आप को बोरवेल की घटना के बाद ?


उत्तर - जी सब भगवान की मर्ज़ी है ,वरना मै तो अपने आप को मारा समझी । बोरवेल अंकल ने मुझे तो फसा दिया था ....मै कुछ समझा नही ...सब न्यूज़ वाले यही कह कह कर सब बात उगलवा लेते है । क्या आप लोग बिना समझ के यहाँ तक पहुचते है । .........बात ये हुई की मै सुबह में खेल रही थी की मुझे बोरवेल अंकल की आवाज़ सुनाई दी ,मै वहां गई तो वो बोले की मुझे तो कोई आज कल पूछ नहीं रहा ऐसा है तो शाम में मेरे पास आकर खेलना और इसमे गिर जाना तुझे मै ज़्यादा अन्दर नही जाने दूँगा । तू मरे गी नही....मै भी मशहूर हो जाऊँगा और तुम भी .........

देखिये अंजू जी मेरे ऊपर आप इल्जाम लगा रही है , आप ही ने तो पैसा पाने के लिए ये सब किया था । आपके पिताजी ने मुझे मुँह ना खोलने के लिए कहा है वरना ....दिखिये बोरवेल अंकल आप मेरे पिताजी पर झूठा आरोप लगा रहे है । मेरे पिताजी तो बहुत गरीब है , आप झूट बोल रही है ...नही आप झूट बोल रहे है .........

यही ख़त्म होता है ये अनोखा साछात्कार हमें अपनी राय अवश्य भेजे ............


Friday, June 12, 2009

"जनहित में जारी -महिला सशक्तिकरणके नुक्सान "

आज मेरा कैमरा मुझे कुछ जानकारी दे रहा था । वो महिला सशक्तिकरणके नुक्सान के बारे में बता रहा था । उसने मुझे बताते हुए कहा .....जनता है फैज़ ..... जब से राष्ट्रपति सर्वोच्च पद पर महिला विराजित हुई थी, तभी से आपराधिक राजनीति के जनक पुरुषों की नींद हराम हो गई थी,और अब तो संसद की स्पीकर भी महिला हो गई है । इधर पत्नी पीडित संघ ने भी इस बात पर खेद प्रकट किया था की ,पुरुषों के लिए एकाध पति का पद तो छोड़ देते ? पंचायतों ,नगरपालिकाओं में ३३%महिलाऐं बिठा रखी थी वो क्या कम थी जो संसद में भी उन्हें आराछ्द चाहिए,वो क्या कम है ? ......पतियों का यह बेहद अपमान है, वो भी पति प्रधान देश में । यहाँ महिलाएं कभी इश्वर के पद पर बैठी है ? भगवान् राम हो या एनी कोई सभी तो पति ही थे । पत्नीयां सदेव इनके चरण दबाते देखि गई है । चाहे वो महा लक्ष्मी हो या सीता । धर्म ध्वजा धारदकरने वाले साधू संत भी इन महिलाओं से प्रसन्न नही है । कल वो उनका आश्रम चलाने लगेंगी तो धर्म का पालन कैसे होगा । अतः यह फ़ैसला तो धर्म संगत हरगिज़ नही होगा ।
यदि सांसद,विधायक,मंत्री पदों पर भी पत्नियाँ बैठ गई ,तो पति क्या झाडू लगायेंगे और रोटी बेलने का कार्य करने लगेंगे । इधर राजनीती में आपराधिक गतिविधियाँ इतनी बढ़ गई है की महिलाए वहां टिक नही सकेंगी । कबूतरबाजी ,फिरौती, घूसखोरी,डकैती,बलात्कार जैसे अपराधो को कौन करेगा ? यदि ये सब अपराध बंद हो गए तो चुनाव में धन कहाँ से आएगा । चैनलों पे स्टिंग आपरेशन नही होगा तो उसे कौन देखेगा । एकाध डकैत फूलन देवी या गाद मदर को छोड़ दे तो महिलाए चुनाव लड़ने के लिए धन कहा से लायेंगी ?चुनावी फंड एकत्रीत करने के लिए खाली पुरुष ही सक्षम होता है । क्या पत्नियाँ गुजरात के सांसद बाबू भाई की तरह दुसरे के पतियों की कबूतरबाजी कर सकती है ? भारतीय पत्नियाँ तो जन्म-जन्मान्तर के लिए एक ही पति चुनने के लिए संकट सोमवार का व्रत रखती है ,और जीवन भर अपने पति की पूजा करती है । चाहे वो कितनी भी पत्नियाँ रखे । वह मारे पीते तब भी वह परमेश्वर है । क्या वो फिरौतीa का धंधा करवा सकती है ? या दुसरे के बच्चो को अगवा करवा सकती है या अगवा करवा कर उनका गला घोट सकती है ? नही .....
३३%महिलाएं यदि पार्षद ,विधायक,सांसद बन गई, तो वो थानेदारों के डंडो से पुरूषों को बचा भी नही सकती । कोई महिला नेत्री किसी अपराधी को छुड़वाने के लिए पुलिस के साथ मारपीट भी नही कर सकती तो लोग उन्हें वोट क्या देंगे । इधर पंचायतो में में जो महिलाये पञ्च, सरपंच बनकर बैठ गई है तो भी कुछ बदला नही है । आज भी वो घूंघट में में रहकर पंचायतो का काम चलती है । अपने पतियों के आदेश पर निर्दय लेकर काम करती है । वास्तव में महिलाये सशक्त नही हुई है और न कभी होंगी । आज भी वो छिनालों की तुलसियों की तरह सास-बहो छाप सीरियल देखकर घंटो सिसकती रहती है । सप्ताह में ४-५ बार उपवास रखती है । भले ही उनके पति दिन -रात दारो पीकर खात तोड़ते रहे । संसद या विधानसभा में जाकर तो वो इन्हे निर्जीव ही बना देंगी । जब वहां गालियाँ नही बाकि जाएँगी , कुर्सियां नही जाएँगी तो क्या मज़ा आएगा ? फ़िर तो संसद और विधानसभाओं में किसी प्रवचनकार साधू का मंडप ही नज़र आने लगेंगे ।


चदक्य ने भी अपने अर्थशास्त्र में लिखा है की महिलाऐं ही महिलाओं की शत्रु होती है । उनका काम राज्य करना नहीं होता अपितु विष कन्या बनकर शत्रु राजाओं का भेद लेना होता है । इससे अधिक वो कुछ भी नही कर सकती । कम से कम राज्य तो नही चला सकती है और नही राज्य के सभापतियों को संचालित कर सकती है । इसी वजह से भारत के सर्वोच्च पद पर महिला के चुने जाने पर महिला नेत्रियों ने ही जमकर विरूद्व किया था किन्तो इस बार कोई दिखा नही जो की अपवाद है । सोनिया गाँधी को प्रधानमंत्री नही बनने देने के लिए सर्वाधिक विरोध उमा भरती तथा सुषमा स्वराज ने किया था । पति पीडित संघ ने महिलाओं को उच् पद पर आसीन करने का घोर विरोध किया है । कथित स्त्री स्वातंत्र्य आन्दोलन के नाम पर, घर भर का बोझ उन्हें पहले ही उठाना पड़ रहा है । पत्नियों के सामजिक कार्यक्रमों भाग लेने की वजह से उन्हें खाना बनाना तथा बर्तन मांजने का काम पुर्व से ही करना पड़ रहा है । इधर नौकरी में अपने बोस की घुड़कियाँ खाना तो रोज़मर्रा का काम है ही । पहले राष्ट्रपति और अब लोकसभा स्पीकर के पद पर एक महिला के आरूढ़ होने के बाद ,उन्हें क्या -क्या कष्ट भोगना पड़ेगा । यह तो भगवान ही जानता है .................


मैंने अपने कैमरे से बरबस ही पूछ लिया ,यार ये बता तेरे दिमाग में ये बात आई कहाँ से । वो बोला घबराता क्यों है तेरी शादी तो अभी नही हुई है । तो जा ऐश कर ये सोचना जनहित में उनके लिए जारी है जो शादी-शुदा है । चलिए ये तो हुई मेरे कैमरे की बात ,आप बताइए मेरा कैमरा क्या सच कह रहा है ........................

Saturday, May 30, 2009

"ये माँ क्या होती है"



माँ................... ये लफ्ज़ सुनते ही मन में मिसरी सी घुल जाती है । आज मेरा कैमरा मुझसे ये जानना चाहता है की ये माँ क्या होती है ....वो मुझसे बोला फैज़ तो माँ को इतना क्यों मानता है ,आख़िर माँ है क्या चीज़ । मैंने उससे कहा सुन माँ क्या है ,दुनिया में रहने वाले सभी लोग क्या कहते है माँ के बारे में .............


किसी ने पूछा माँ क्या है ? कौन है ?.......................................


समंदर ने कहा -माँ एक ऐसी हस्ती है ,जो औलाद के सरे गम अपने सीने में छुपा लेती है !


बादल ने कहा-माँ एक कली है , जिसमे हर रंग साफ़ तौर पर नुमाया है !


माली ने कहा- माँ बाग़ का वह खूबसूरत फूल है , जिसमे पुरे बाग़ की खूबसूरती और महक है !


शायर ने कहा- माँ एक ऐसी ग़ज़ल है ,जो हर सुनने वाले के दिल में उतर जाती है !


औलाद ने कहा- माँ ममता की वो दास्ताँ है , जो औलाद के हजारों गम और हर दिल पर कुर्बान हो जाती है !


जज ने कहा- माँ एक ऐसी हस्ती है , जिसकी तारीफ़ के लिए दुनिया में अल्फाज़ नही मिलते !


फरिश्तो ने कहा - माँ वह शख्सियत है , जो औलाद की खुशहाली के लिए हमेशा दुआ करती है !


स्वर्ग ने कहा - माँ वो हस्ती है जिसके कदमो के निचे मेरी रिह्यिश है !


ईश्वर ने कहा - माँ मेरी तरफ़ से कीमती और नायब तोहफा है दुनिया वालों के लिए !


दुनिया कहती है - मुझे माँ और फूलों में कोई फर्क नही नज़र आता !


लकिन मैंने कहा - माँ नूर है ,महक है , फूल है , रंग है , प्रार्थना है , मोहबत है , ममता है , तोहफा है ,जज्बा है और माँ ममता है !...................................


अब मेरा कैमरा मेरे पास बैठा था वो जारो-क़तर रो रहा था और मुझसे पूछ रहा था...फैज़ मेरे पास माँ क्यो नही है । ये तो हुई मेरे कैमरे की बात ,लकिन आज कितने ही लोग है जो अपनी माँ को कुछ नही समझते ,भेज देते है उन्हें वृधा आश्रम में मरने जीने के लिए ,क्या उन्हें नही पता की माँ क्या होती है । अब आप बताइये की आपकी नज़र में माँ का क्या दर्जा है ........

Thursday, May 28, 2009

"मज़बूत होता महिला वर्ग"

आज मै काफी दिन के बाद कंप्यूटर पर काम कर रहा था की मेरा कैमरा मुझसे आकर बोला ,फैज़ कहा था तो दिखाई नही दे रहा था ,क्या कही गया हुआ था ....नही यार मेरे एक्साम चल रहे थे । अच्छा बता क्या बात है । कुछ नही तेरे छेत्र से जोड़ी एक ख़बर थी ,जनता है आंध्र प्रदेश में हैदराबाद से १०० किलोमीटर दूर पास्ता पुर गाँव में महिलाओं ने एक कम्युनिटी रेडियो की शुरूआत की है ।


अच्छा तू मुझे विस्तार से बता ,ले सुन............... आंध्र प्रदेश की राजधानी हैदराबाद से 100 किलोमीटर दूर पस्तापुर गाँव में स्थानीय कम्यूनिटी रेडियो ग़रीब महिलाओं के लिए खेतीबाड़ी की सूचना देने के साथ-साथ उनकी एक आवाज़ बन कर उभरा है ।डेक्कन डेवलपमेंट सोसायटी (डीडीएस) से जुड़ी एक कार्यकर्ता टी मंजुला लोगों के घर जाकर पैदावार के बारे में पूछताछ करती है और खाद्य वितरण करती हैं. ये उनके नियमित काम का हिस्सा तो है मगर वह अपनी रेडियो पत्रकार की भूमिका को लेकर काफ़ी उत्साहित हैं. पस्तापुर के एक साधारण घर में बने स्टूडियो से हर दिन दो घंटे प्रसारित होने वाले रेडियो कार्यक्रम में खेतीबाड़ी, स्वास्थ्य और संगीत के बारे में छोटी-बड़ी जानकारी दी जाती है. गाँव में ज्यादातर ग़रीब दलित महिलाएँ हैं. टी मंजुला भी भारतीय समाज के हाशिए पर रहने वाली एक जाति से ताल्लुक रखती हैं. वह कहती हैं, "स्थानीय स्तर पर मौजूद ज्ञान के भंडार को इकट्ठा करना हमारे लिए सुखद अनुभव है । यदि ऐसा नहीं करते तो ये अनुभव परिवारों में ही सिमट कर रह जाते । " मंजुला का कहना है, "कई लोगों को इससे फ़ायदा हुआ है और मैं हर दिन कुछ नया सीख रही हूँ ।"कम्यूनिटी रेडियो गाँव में इस कदर चर्चित हुआ है कि गाँव की कई महिलाएँ रेडियो कार्यक्रम में अपना योगदान दे रही है । क्यों है न कमाल की बात फैज़ सिमित संसाधनों में इतना सब कुछ ,वाकई कबीले तारीफ है । इतना ही नही ये जानकारी के साथ आमदनी भी करती है ...........खेतीबाड़ी के काम के अलावा एच लक्ष्मम्मा कम्यूनिटी रेडियो के लिए हर महीने क़रीब 10 घंटे का कार्यक्रम तैयार करती है । वह कहती हैं कि इससे उन्हें क़रीब 450 रुपए हर महीने मिलते हैं जिससे वह अपने घर वालों के लिए खाद्य सामग्री ख़रीदती हैं । लक्ष्मम्मा के पति ने कई वर्ष पहले उन्हें छोड़ दिया था। वह अपनी एक बच्ची का लालन-पालन ख़ुद करती हैं साथ ही वह डीडीएस की प्रमुख सदस्य भी बन गई हैं । गाँव में महिलाओं का जीवन कठिन है । औपचारिक शिक्षा के अभाव में वे पास के खेत में मज़दूरी करती हैं । गाँव में कम्यूनिटी रेडियो के आने से पहले उन्हें खेतीबाड़ी के क्षेत्र में इस्तेमाल किए जाने वाली नई तकनीकी, कैसे अपने फसल को बेहतर दामों में बेचा जाए इसकी बहुत कम जानकारी रहती थी । वे आस-पड़ोस को लोगों से बात कर या खेत में साथ काम करने वाले मज़दूरों से ही जानकारी जुटाती थीं । कम्यूनिटी रेडियो के माध्यम से अब वे ज्यादा से ज्यादा जानकारी पा रही है ।
तो अब तुम्ही बताओ फैज़ कौन कहता ही की महिलाये कमज़ोर है । कौन कहता है की ये अबला है .......
मेरा कैमरा शायद सच कह रहा है ,आप ही बताइए क्या सरकार को इनको आराछाद देना चाहिए ....या नही ,क्योंकि हो सकता है कल को ये कमुनिटी रेडियो भारत को विश्व पटल पर अंकित करने में महती भूमिका निभाए । तो सोचिये और बताइए........

Thursday, May 21, 2009

"जनता को मिले रेल,बिजली,सड़क,पानी"

मेरा कैमरा आज अच्छे मूड में था । मेरे ऑफिस से आते ही बोला ,बताओ तुम्हे कौन सा मंत्रालय चाहिए रेल ,बिजली ,पानी ,सड़क ,रछा ,वित्त या फ़िर और कुछ .......मैंने कहा तेरा दिमाग तो नही ख़राब हो गया है । मै कोई सांसद थोड़े ही हूँ जो मुझे मंत्रालय मिलेगा ,वो बोला अरे भाई न्यूज़ नही देखते क्या । क्यों क्या हुआ प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के पास सांसदों की कमी है क्या ? नही यार आज दिन भर जो राजनितिक ड्रामा चला है उसे तुम देखते तो तुम भी यही कहते ,अच्छा बता क्या हुआ आज ..........

होना क्या था करूणानिधि जी का लड़का और लड़की दोनों सांसद हो गए है, अब वो ये मौका तो छोड़ने से रहे उनकी नज़र स्वास्थ्य, दूरसंचार, बिजली, भूतल परिवहन और रेलवे जैसे मंत्रालयों पर है । वहीं तृणमूल कांग्रेस की माँग है कि मंत्रिमंडल में उसके मंत्रियों की संख्या डीएमके से एक अधिक होनी चाहिए । सबसे अधिक खीचातानी तो रेल मंत्रालय के लिए मची है ,मेरे सूत्रों के अनुसार करूणानिधि अपनी बेटी को ये मंत्रालय दिलाना चाहते है ,वही अगर तृणमूल कांग्रेस की माने तो उनकी पार्टी प्रमुख मामता बनर्जी इसकी प्रबल उम्मीदवार है ।
रेल मंत्रालय पिछली बार राष्ट्रीय जनता दल के लालू प्रसाद यादव के पास था लेकिन इस बार उनकी पार्टी को केवल चार सीटें ही मिली हैं ।
ऐसी ख़बरें हैं कि कांग्रेस ने सहयोगी दलों के लिए एक फ़ॉर्मूला तय कर लिया है । इसके मुताबिक हर सात सासंद पर एक कैबिनेट और एक राज्यमंत्री का पद दिया जाएगा । इसी दबाव को देखते हुए गुरुवार सुबह कार्यवाहक प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल के बीच होने वाली बैठक स्थगित कर दी गई । इस बैठक में प्रधानमंत्री राष्ट्रपति को मंत्रिमंडल में शामिल होने वाले लोगों के नामों की सूची सौंपने वाले थे । मनमोहन सिंह शुक्रवार को प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने वाले हैं ।

अब तुम्ही बताओ फैज़ अगर ते लोग झगडा करेंगे एक सीट के लिए तो नई सरकार का गठन कब होगा ,तुम खाली हो इसलिए मैंने तुमसे कहा की तुम ही कुछ बन जाओ । नही यार ऐसे नही होता ये सब राजनितिक खेल है तू नही समझेगा ,जब तक ये सब नही होगा सरकार में इन घटक दलों को कोई नही पूछेगा ,इसलिए ये सब नौटंकी कर रहे है समझा तू परीशान मत हो।

आप ही बताये क्या होगा इस देश का जब तक ये सब होगा । बिना बहुमत के सरकार बनने का मौका मिले और टाइम पर आपके पास आपके मंत्रिमंडल की लिस्ट ही न हो ,जिसकी वजह से आप सरकार न बना पाए ,आप राष्ट्रपति से तय समय पर मिल न पाए, तो इसका क्या असर जाएगा जनता पर ,क्या वो आपको दुबारा चुनेगी ,आप कह रहे है की ये घटक दलों की वजह से हुआ है तो फिर कैसा है आपका संघटन ,क्या वो इतना कमज़ोर है की एक मंत्री नही चुन सकता । जल्दी कीजिये वरना क्या होगा भगवान ही जाने ,कही मेरे कैमरे की बात सत्य हो गई तो हमें चलाना पड़ेगा देश को ,और आप हमारे आगे पीछे दौडेंगे ।

Wednesday, May 20, 2009

"इधर सर घुमाओ-तो इधर सर घुमा लो"

मैंने कहा टांग ऊपर ...अच्छा बाबा अभी लो । गर्दन नीचे ....जो हुक्म मालकिन । जाओ ये सामन ले के आओ ...अभी लाया । ................... ये सब बातें आज मैंने अपने कैमरे के मुँह से सुनी, जब मै आफिस से घर पहुँच तो वो सुबह का अखबार पड़ रहा था , उसने मुझे रोक के कहा ,तू तो बच गया फैज़ मैंने पुछा क्यों क्या हुआ वो बोला,अरे अगर तेरी शादी हुई होती न तो ये सवाल कभी न पूछता । जानता है - सुप्रीम कोर्ट ने कल कहा कि पति को पत्नी का सुझाव स्वीकार करना ही होता है, भले ही उसका कोई मतलब हो या नहीं।
अदालत के अनुसार अगर आपकी पत्नी कहती है कि सिर उधर घुमाओ तो उधर सिर घुमा लो, यदि वह कहती है कि इधर सिर घुमाओ तो इधर सिर घुमा लो, नहीं तो आपके लिए मुसीबत हो सकती है ।
सुप्रीम कोर्ट की खंडपीठ ने ये दिलचस्प सुझाव एक वैवाहिक विवाद से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान दिया ।
इसमें वायु सेना के अधिकारी ने अपनी अलग रह रही पत्नी पर उसे और उसके परिजनों पर विभिन्न आपराधिक मामलों में फँसाने का आरोप लगाया है।
अब तुम्ही बताओ फैज़ क्या होगा इन बेचारे शादी शुदाओं का ,पहले तो सिर्फ़ फिल्मो में लोग देख कर एक दुसरे का मजाक उडाया करते थे ,लकिन अब तो सुप्रीमकोर्ट ने सुझाव दे डाला है ,अब तो बेचारे फँस गए क्योंकि महिलाएं पहले से ही आराछाद्द की मांग कर रही है ,और अब ये सुप्रीमकोर्ट का सुझाव।
औरतों को काफ़ी छूट मिल रही है यानी की अब कुछ दिनों बाद ऐसा समय आने वाला है की पुरूष वर्ग आराछाद्द की मांग करता नज़र आएगा और महिला जगत इनकी मांग ठुकराएगा बार बार । सब तरफ़ महिला संघ सुप्रीमकोर्ट के इस फैसले का समर्थन करते दिख रहा है ।
तो फिर तैयार हो जा अपनी पत्नी की गुलामी करने के लिए ,वरना सोच ले ..............

Sunday, May 17, 2009

"आधुनिक मोसमी का रस"

आज सत्ता के गलियारों में काफी चहल पहल थी, सभी नेता एक दुसरे के दिल का हाल जानने में लगे थे ,सभी अपने समर्थकों से घिरे थे ,किसी के पास बात करने की फुर्सत नही थी । मेरा कैमरा भी कड़ी धुप में उन सांसदों का इंतज़ार कर रहा था जो दिल्ली एअरपोर्ट पर उतर रहे थे ,आख़िर उसे भी तो उनके फोटो खीचने थे तभी किसी ने उसे जोर का धक्का दिया और वह औंधे मुँह ज़मीन पर गिर गया किसी ने उसका हाँथ पकड़कर उठाया किन्तु अब वह अपनी जगह से काफी दूर था ,वहां से फोटो तो क्या वो उन्हें देख भी नही पा रहा था,वो गुस्सा हो गया और उसने पूछा की आख़िर कौन था जिसने मुझे टक्कर मारी, किसी ने बताया की वो किसी प्रत्याशी का समर्थक था । .....
अब वो मेरे पास बैठा था हमारे आफिस में जहाँ वो काफी गुस्से कम था मैंने आख़िर उससे पूछ ही लिय और उसने ये सब बातें बताई । इसमे एक ख़ास बात सामने आई की प्रत्याशी जीतने के बाद आपने समर्थकों को नही भूलते है । आप सोच रहे होंगे की मैंने ऐसा क्यों कहा ,तो सुनिए जिस समर्थक से टक्कर खाकर मेरा कैमरा गिरा था उसने शराब पी रखी थी । .............जब ये प्रत्याशी जीत जाते है तब इनके साथ ५०० नए नेता अगले पाच सालो के लिए जन्म ले लेते है, और ये इन सांसदों के पैसें पर ऐश करते है। इनके लिए जोश से भरी आधुनिक रस की पेटी खोल दी जाती है ,और ये उसमे पाच साल तक सराबोर होते रहते है । उन्हें क्या पता इसी वजह से आज तक कोई दलित या शोषित उनके सामने नही खड़ा हो सका है , उन्हें तो सिर्फ़ अपने दारू और मुर्गे की फ़िक्र है ,जो दिलवाएगा वही उनका माई-बाप है । सभी भइया की जी होजुरी करते है , और भैया के चमचे उनका फायदा उठाते है । .............

क्या भारत पूर्व राष्ट्रपति डॉ अब्दुल कलाम के सपनो को साकार कर पायेगा ,उनका विसन २०-२० कामयाब होगा ,जिसमे उन्हूने हर जाती-समुदाये को एक मंच पर लाने की बात कही है । मुझे तो ऐसा नही लगता क्योंकि आज भी भारत की आधी आबादी इस सोच सोच में है की हमारे बदलने और न बदलने से हमारे देश का क्या बिगडेगा या बनेगा । फिलहाल तो सभी सत्ता बनाने में लगे है.....जब बन जायेगी तो देखा जाएगा की भारत किस रह पर आगे बाद रहा है । इस समये तो खाने खिलने और पीने -पिलाने का दौर चल रहा है ...........

Saturday, May 16, 2009

"पाँच साल की आकस्मिक बंदी"

आइये कल की बात पूरी करने का समय हो गया है ,बिछ गई है सत्ता की बिसात कौन हुआ फ़ेल कौन हुआ पास .......किसको करने को मिलेगा राज्य किसको करनी होगी राज्य की रखवाली .......आप सोच रहे होंगे की मैंने ऐसा क्यों कहा की राज्य की रखवाली ,अरे भाई सीधी से बात है जब तक कोई विरोध नही करता आदमी आगे नही बढ़ता या सही काम नही करता ,तो फिर विपछि दल को अपनी कमर कसनी होगी । अब देश का भविष्य उनके हाँथ में है । आज जब मै ये पोस्ट लिख रहा हूँ तो मेरा कैमरा मुझ पर हंस रहा है । वो बोल रहा है की फैज़ तेरा दिमाग तो नही ख़राब है,कभी सत्ता विपछि दल ने भी चलायी है ,मैंने कहा बेवकूफ किसी ने आज तक इस नज़रिए से सोचा ही नही था । ये बता तो जब काम करने जाता है तो तुझे अच्छा कम करने की प्रेरणा कौन देता है ,वो बोला सीधी सी बात है ,जभी कोई दूसरा कैमरा अच्छा कम करता है तो मई उससे भी अच्छा काम करने की सोचता हूँ ,या जब कोई मेरी बुराई करता है तब भी मै अच्छा काम करता हूँ ......मुझे एकदम से रोकते हुए वो बोला अच्छा अब समझा तो ऐसा क्यों कह रहा था ,लगता है तुझे विक्रम जी की baat का असर हुआ है तो मुझसे आगे निकलना चाहता है न ठीक है । आज जनता के बीच कुछ नए सांपो ने फन failaya है । ये सांप अगले पाँच सालों तक हमारी प्यारी भोली भली जनता को द्दस्ते रहेंगे ,और हमारी प्यारी जनता इनके आश्वासनों की मलाई की बरसात मै इतना सरबूर रहेगी की उसे कुछ नही दिखाई देगा । जब कुछ हो जाएगा तो वो अपनी दिली भडास सरकार पर निकाल लेंगे कोई ये नही आवाज़ उठाएगा की हमारी ये परेशानी है क्योंकि सब डरते है कौन लद्दे सिस्टम के khilaaf ,और फिर पाँच साल बाद आएगा चुनाव हम और आप जैसे लोग फिर इनके उनके साथ दौडेंगे लेकिन मिलेगा क्या कुछ भी तो नही । खैर संभल के रहिएगा इन सांपो से कही आपको भी न दस लें । कल सत्ता के गलियारों मै काफ़ी चर्चा होगी की कौन सरकार बनाएगा तो आप भी गौर से दखिये की कल क्या होता है मे और मेरा कैमरा तो देखेंगे ही.........

तो हो गई छुटइ अगले पाँच सालों की अभी तक ये जनता का हुक्म मानते थे अब जनता इनके हुक्म पे चलेगी .......

"मीडिया की चर्चा से जनता की आवाज़ तक"

मैंने कल आपने ब्लॉग का नाम बदल दिया । क्यों ये आप सब को बताना ज़रूरी है । बात दरअसल ये हुए की मैंने तो चर्चा मीडिया की ही शुरू की थी ,लकिन किसी ने मेरा साथ नही दिया ।

वही मेरे पास मौका भी था और समय भी,क्योंकि शुरू हो चुका था चुनावी महापर्व तब मैंने सोचा की हम पत्रकारों का काम तो जनता की आवाज़ को उठाना है नाकि अपने ही रस्ते बंद करना फिर हमारा ये कर्तव्य है की हम जनता को सरकार की नीतियों के बारे में जागरूक करे । बस यही सोच और विचार करकेही रहा था की मेरा कैमरा भी बोला की हाँ नाम तो बदलना ही पड़ेगा फिर क्या था एक अच्छा सा नाम ढूँढा गया और वो आप के सामने है । कैसा लगा आप सभी को मीडिया की चर्चा का जनता की आवाज़ बनना ....

Friday, May 15, 2009

"सांप ने केचुली बदली"

आज जैसे जैसे दिन गुज़र रहा था सभी जगह पर जीत हार के कयास लगाये जा रहे थे ......सभी जगह चर्चा का बाज़ार गर्म था । सब एक दुसरे से ये कहने में पीछे नही हट रहे थे की हमारा प्रत्याशी ही जीतेगा । उसी समाये मेरा कैमरा भी बाहर से लौटा था काफी जल्दी बाजी में था ,मैंने उसे रोकना चाह तो वो हाथ झटक बहार की ओर चल दिया बोला तुझसे शाम को मिलता हूँ ......................

शाम को मैउसका इंतज़ार कर रहा था की तभी वो आ गया । मैंने कहा भैये आ मेरे पास भी कुछ पल बैठ .उसने बैठने के बाद एक लम्बी साँस भरी और बोला पूछो क्या बात है ,सुबह से जीना मुहाल कर दिया है तुमने , .......मैंने कहा यार तू तो सुबह से लोकतंत्र के मह्राथियों के छेत्रमें था क्या पता चला कौन जीत रहा है ।
नही यार ऐसा कुछ भी नही पता चला, सब कह रहे है की हमारी पार्टी पूर्ण बहुमत से केन्द्र में सत्ता बनाएगी । हम एक बड़ी पार्टी के रूप में उभर के सामने आयेंगे ,हमें किसी दल के सहयोग की ज़रूरत नही है .............पर तू तो जान ही रह्जा है क्या चल रहा है यहाँ पर आज कल ,सभी पार्टियाँ गठबंधन की राह पर अग्र्र्सर है,सभी आपने सहयोगी दलों को मानाने में लगा हुआ है ,अब न कोई अपराधी है न कोई जालसाज,सब आपस में भाई भाई है । जो चुनाव से पहले एक दूसरे को गालियाँ देते थे आज वो गले में हाथ डाले गली गली टहल रहे है ,अब वो भाई है एक बड़ा तो दूसरा छोटा ,दोनों में कोई मन मुटाव नही है । .....कल तक यही नेता किसी और पार्टी के नेता को भाई कहता था और अब वो तो उसकी नज़र में कसा........से भी गए गुज़रे है । ..........
अब इन नेताओ को क्या कहा जाए जो सांप को भी शर्मिंदा करने पर तुले है ,वो साल भर में एक बार केचुली बदलता है और ये छे महीने में दो बार । फैज़ तुम्ही बताओ क्या होगा भारत का भविष्य ,अगर हमारा देश इन केचुले बदलने वाले सांपो के हाथो में रहा तो ये उन्नति नही करेगा बल्कि ये उसे फ़िर से गुलाम बना देंगे ।
खैर अब तो चिडिया खेत चुग चुकी है अब तो सिर्फ़ उसके नुक्सान का इंतज़ार करना है । कल फ़िर मिलेंगे अगले पाँच सालों के सांपो के साथ .................

Wednesday, May 13, 2009

"पीत राजनीती "

आज मै अपने-आप को ठगा सा महसूस कर रहा हूँ । कल राजनीति में कुछ नया हो गया और मुझे भी कुछ याद आ गया .......आज कल राजनीति का रूप बदल रहा है । कल मेरा कैमरा मुझसे बोला यार फैज़ ये कैसे राजनीति हो गयी है आज कल .......पहले राजनीति देश को आजाद कराने के लिए हुई ,फिर देश को मजलूमों के हांथो से बचाने के लिए हुई,फिर दलगत राजनीति का दौर आया । पर अब ऐसा लगता है की राजनीति दलगत ,स्वार्थगत ,जातिगत होने के बाद पर्सनल हो गई है यानी .....अब राजनेता किसी पार्टी के ऊपर नही आछेप करते है बल्कि अब पार्टी के सदस्यों पर ऊँगली उठाते है । उनके चरित्र पर लांछन लगाते है । किसी को उससे कोई फर्क नही पड़ता की उस व्यक्ति का उससे क्या नुक्सान हो रहा है ........सभी को एक दुसरे की पर्सनल बातें सामने लाने में मज़ा आने लगा है । कोई यह मौका हाथ से जाने नही देना चाहता । सब को एक अलग पहचान जो चाहिए । इस तरह एक तीर से दो निशाना जो लग रहा है ,सभी मीडीया वाले इन खबरों को प्रमुखता से जो दिखाते है ,और क्यों न दिखाए हर वक्त नई ख़बर चलने के दबाव को झेलने से अच्छा है की यही दिखाएँ । कल तक जो नेता एक दुसरे के लिए मरने मारने की बात करते थे,आज वही एक दुसरे की निजी ज़िन्दगी के बारे में लोगों को बता रहे है । जैसा की हाल ही में एक राष्ट्रिय पार्टी के बड़े नेता ने पार्टी की एक प्रमुख नेत्री के बारे कुछ ऐसा कहा की वो तो प्रसिद्ध हुए ही साथ ही पार्टी भी प्रसिद्ध हो गई । ...................................... मेरा कैमरा बोला फैज़ ये सिर्फ़ पार्टी को प्रसिद्ध करने के लिए है की कुछ और ....मैंने कहा यार जो काम पहले रिपोर्टर करते थे उससे ये नाराज़ हो जाते थे इसलिए अब ये ख़ुद ही एक दुसरे का स्टिंग कर लेते है यानि अब राजनीती ने नया रूप अपना लिया है ....जिसे "येल्लो पोलिटिक्स" कह सकते है ।


तो फिर सोचिये क्या होगा कल भारत का भविष्य ,क्या होगा भारत का राजनितिक भविष्य क्या कोई युवा राजनीती में आगे आयेगा या नही .......सोचे और लिखे ...........

Sunday, May 10, 2009

"कथित कृषि प्रधान देश"

आज पुरा भारत चुनाव की आग में जल रहा है ,और वही किसी मलिन बस्ती में किसी गरीब का पेट भूख की आग में जल रहा है , लकिन किसी को क्या फिक्र ,सब तो अपनी स्वार्थ की रोटियों को इन भूखे पेट की आग में पकाने में लगा हुआ है । आज भारत सरकार दावे करती है की देश की विकास दर ८-९ है ,जबकि देश की कृषि व्यवस्था दिन - प्रतिदिन खस्ता होती जा रही है । आज हमारे यहाँ लोकतंत्र की जोड़ तोड़ चल रही है , पैसा पानी की तरह बहाया जा रहा है ,लेकिन कृषि की सुध लेने वाला कोई नही दिन प्रतिदिन गहूं की पैदावार गिरती जा रही है । किसान बदहाल है कृषि यंत्रो ,उन्नत बीजों, अच्छे उर्वरको के दाम दिन-बा-दिन बढ़ते जारहे है


चावल उत्पादन में भी गिरावट आई है । सरकार अगले ५ सालों में इन सब के उत्पादन पे ज़ोर दे रही है । लेकिन यह सरकारी प्रयास कितना सफल हो पायेगा ये कहना कठिन है । वर्तमान हालत हे इतने कठिन है की भविष्य की कल्पना कर के ही सिहरन दौड़ जाती है । संयोक्त राष्ट्र अमेरिका की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में २६ करोड़ भूखे है । हालाँकि एक राष्ट्रिय सर्वेछ्द के अनुसार भारत में २६ करोड़ से ज़्यादा की आबादी भूख मरी का शिकार है । इन्हे ही गरीबी रेखा से नीचे का आदमी बताया जाता है । जब भारत का एक उद्योगपति (मुकेश अम्बानी ) दुनिया का सबसे धनि बन चुका है ,तब भारत की एक चौथाई आबादी की इस दुर्गति से भारत के असमान विकास को समझा जा सकता है । ऊनेसको की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में ४७% बच्चे कुपोषद के शिकार है ।

भारत में कृषि ,किसान, खित-मजदूर, ग्रामीण-विकास ,सिचाई,सस्ते और उत्तम बीज,प्राकृतिक खाद,प्राकृतिक-बिजली आदि पर दयां नही केन्द्रित किया तो आगामी वर्षों में भूख मरी और भूखो के विद्रोह बहुत ही तेज़ी से विस्तार होगा और इस कथित कृषि प्रधान देश को रसातल में जाने से रोकना कठिन होगा ..............

तो फिर जागिये क्योंकि कब ये भूखमरी आप को अपना शिकार बनाएगी पता नही ...............

Tuesday, May 5, 2009

"लावारिस लाश"

अब चुनाव खत्म होने वाला है । कितने ही महारथियों का भाग्य एल्क्ट्रोनिक वोटिंग मशीन में बंद हो चुका है । चुनाव आयोग काफी खुश है । हर जगह चुनाव बिना हिंसा के हो रहे है अगर पहले चरण को छोड़ दे तो कही कुछ भी नही हुआ । लकिन चुनाव आयोग का डंडा उन मासूमो पर भी पड़ा है ,जो इस महापर्व का बेसब्री से इंतज़ार करते hai । हाँ........... वो गरीब और बेसहारा है जो कभी खाली पेट सोते है या कभी पानी पी के उनके लिए ये चुनाव खुशियाँ लेकर आता था । लेकिन अब बैनर ,पोस्टर पर चुनाव आयोग ने अपना चाबुक चला दिया है जो सीधे उस गरीब के ऊपर चल रहा है । पर सरकार का क्या उसे कोई मरता है तो की क्या फर्क पड़ता है । उसकी रोटी जनता को झूठे वादे देकर पकती है ।

मुझे एक कहानी याद आरही है ..........एक -एक बिरजू उठा और अपनी पत्नी से बोला तो सो जाना मेरे आने का इंतज़ार मत करना । धनिया बोली "तो का जरूरत है जावे की " पर बिरजू की नज़र उसकी फटी साडी पर पद चुकी थी । आज बिरजू जब कम करने के बाद एक पार्टी कार्यालय पर पंहुचा तो वह आधिक से अधिक बैनर - पोस्टर अपने रिक्षे में भर लेना चाहता था । वह जगह जगह पोस्टर बैनर बांधता चल रहा था । आखरी बैनर बंधना बाकी था ....उसका पहला सिरा दीवार के कुंदे में बंधने के बाद दूसरा किनारा बंधने के लिए जैसे ही सड़क किनारे लगे ट्रांसफार्मर पर चढा एक भाम्म की आवाज़ आई और उसका लगभग जल चूका शरीर ज़मीन पर आकर गिरा । एक शोर हुआ और पार्टी प्रत्याशी अपने कार्यकर्ताओं के साथ वहा पहुच गए । किसी ने कहा मालिक ये तो मर गया वो बोला "अबे जल्दी से बैनर उतार किसी ने देख लिया तो मुद्दा बना देगा " जल्दी जल्दी बैनर उतरा गया । लाश को कही दूर फैंक दो कौन पूछेगा "लावारिस लाश" को .................

तो आप ही बताये ये सरकार का दोष है की उसने ये काम बंद कर दिया ..............................................

याफिर उन पार्टियों का जो इन्हें सिर्फ लाभ के लिए काम देते है वरना फिकवा देते है " लावारिस लाश "कही सुनसान में जहा किसे की नज़र न पड़े .......................

Saturday, May 2, 2009

व्हाट डिड वी डू टीवी वाज़ अब्सेंट फ्रॉम ऑवर लाइफ

Doing nothing and sitting in front of the ‘box’ an entire day is a feat by itself and I just did it…. Ha !
Albeit a little frustrating, because the home team lost in the final moments. But today an entire day withered away in the name of IPL. Two games of equal interest and excitement. Lunch and dinner without moving anywhere, right in front of you and in front of the ‘idiot’ and many finger nails losing their bite - heart rates an all time high and all !!
What did we do when TV was absent from our lives ? How did we occupy ourselves ?
Its become our most earnest and sincere friend, this tube device. Nothing to talk about put on the TV. Waiting on something, put on the TV. All alone and no company, put on the TV. What’s the situation in the country, put on the TV. What’s the situation in the world, put on the TV. Weather, TV. Sport, TV. Film, TV. History documentation, TV. Want to get slumber, TV…
There is just no end to it. A boon in our lives. And pretty soon we shall be carrying it around with us on our mobiles !!

So, yes a really lazy uncoordinated and mindless day. Allowed the brain to rest and recover. For a challenge tomorrow and hopefully many more tomorrows.
Abhishek won a recognition and left for Delhi. NDTV nominated him for the best Brand representative and rewarded him at a ceremony, for his campaign for IDEA Cellular and Motorolla. He seemed happy about it, as did his clients. And we feel happy for him.
Tomorrow is voting day in our part of the city and we are all geared up to be there and cast it. TV and print media are full of nothing else but possibilities and analysis on the prospects of various parties and candidates. I do not find that too odd. The elections in India make interesting information even in other parts of the world. We are the largest democracy in the world. We are among the two fastest developing nations in the world. We are among the very very few in the world that have not been as severely hit by the recession as others in the western world have. And come May 16th, we shall have a new Government for the next 5 years, so help me God. One never knows politics, entirely.

There has been talk among certain media of wanting to carry my blog in their paper. That I come to an understanding with them that I allow them to publish it exclusively. The deal being that the blog shall, as a result of the vast circulation of the paper, give me and my posts a larger reach to the people of the country.
I ask you .. put in your vote for this exercise and tell me whether this is worth considering. I shall not name the house of media that wishes so, for, that would be unethical and premature because the information has yet not come from them. It has come to me from those that contribute to it.
My own reading of the situation is that this would tantamount to parting with my exclusivity to another entity and in turn therefore preventing access of it to other houses of the print and electronic media. We also do not know how the house would exploit this. Or if it exploited it, what conditions would it put. There were accusations in the beginning from them that I was being paid to write. When the denial from me threatened to take a more legalistic turn, their denial, a most apologetic denial, eventually came through. Today they are the ones that are instigating commerce into my blog. Strange are the ways of the world and of course of the media.
There is talk also of building ‘Star Diaries’ for the print media. A biweekly input from all the stars of their life and works during each day or week or month. I believe this is all emanating from the popularity that the blog from various stars is generating and the desire of the print to be in control of that as well. It is flattering to learn that an acknowledgement of independent internet, a medium I believe to be a most powerful one in the days and years to come, to be causing interest or discomfort to the traditional media.
‘Social and political life may soon be driven by the “network”‘
‘Top global public intellectuals, thanks to an online mobilisation of their followers, could use the network not only to transform online publishing but also to redefine public intellectual life in a digital age.’
These are interesting observations that I have quoted from a recognized forum, a forum that has a certain degree of authenticity and stance due to the practice of conducting in practical terms what it preaches.
You, dear reader, therefore, are fast becoming the reason and the condition for this change. Your contribution is vital in the furtherance of our medium; started quite innocuously to connect with well wishers. So, reason out when you consider your response. Your decision could change many other decisions !!

Saturday, April 18, 2009

"इंटरनेशनल प्लेयर लीग"

कल रात जब मै घर पहुँचा तो देखा मेरा कैमरा सोफे पे बैठा टीवी देख रहा था । मैंने घर वालों से पूछा की ये कब आया तो उन्होंने मुझे बताया की ये तो दोपहर को ही आ गया था



कुछ देर बाद मैंने उससे पूछा ........तुझे तो मैंने "इंडियन प्रेमेयर लीग" को कवर करने साऊथ अफ्रीका भेजा था न फ़िर तो वापस क्यों चला आया ......वो बोला -मैंने अच्छा किया जो चला आया वहां रहता तो मै अपने आप को रोक नही पाटा । मैंने उससे पूछा ऐसा क्या हो गया। उसने कहा.................

इंडियन प्रीमीयर लीग के कमिश्नर ललित मोदी ने इस के पहले सत्र की शुरुआत पर कहा था की ये लीग भारत के उन युवाओं को मौका देने के लिए है जो अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन सही से नही कर पाते । इसके द्वारा वो युवाओ को मौका देना चाहते थे । ताकि हमारे देश को एक मज़बूत टीम मिल सके ...........लेकिन क्या हुआ ,राजस्थान रोयल्स ने अपने ८ इंडियन खिलाडयों को टीम से बाहर का रास्ता दिखा दिया .जिसमे हमारे राज्य का क्रिकेट कैप्टन मोहमद कैफ भी शामिल है । वही उनकी देखी - देखा किंग्स ११ पंजाब ने भी अपने ४ युवा खिलाड़ियों को बाहर निकाल दिया । मुझे इस बात का बड़ा दुःख हुआ और मैं वापस आगया । .........

खैर मेरा कैमरा तो हमेशा ही कुछ न कुछ बोलता रहता है । लेकिन उसने आज एक बहुत अहम् मुद्दा उठाया है ...आप ख़ुद सोचिये क्या विदेशों में होने वाले काउंटी क्रिकेट में विदेशी कैप्टन होते है ...आप ख़ुद कहेंगे नही । तो फिर भारत की प्रीमियर लीग में शामिल ८ टीमो में ५ के कप्तान विदेशी क्यों ? क्या कभी सचिन या फिर द्रविड़ को किसी काउंटी क्लब ने कैप्टन नियुक्त किया है नही न तो फिर हमारे देश में ऐसा क्यों ? क्या हम आज भी उनके गुलाम है ........शायद इस बात से तो यही लगता है ।

अगर ऐसा ही होता रहा तो युवा वर्ग इससे भी किनारा कर लेगा ,और फ़िर वही समस्या सामने आएगी जो पहले थी । प्लेयर अपने घरों और गली क्रिकेट में अपना दम तोड़ देंगे । फिर खिलाड़ियों के चयन में सौदेबाजी शुरू हो जायेगी ............


तो ललित जी सचेत हो जाइये कल को ऐसा न हो की आपकी इंडियन प्रिमेयर लीग धीरे धीरे इंडियन प्लेयर लीग,इंडियन पैसा लीग , इंडियन परदेसी लीग होने के बाद अब ......"इंटरनेशनल प्लेयर लीग "न बन के रह जाए .........वरना न आप को दर्शक मिलेगा और नही पैसा ।

तो फिर सोचना शुरू कीजीये अभी ..................

Tuesday, April 14, 2009

"गली-गली सिम-सिम"

ख़त्म हो गया प्रसार प्रचार ......पहले चरण का मतदान कल ............ सभी प्रत्याशी घर घर जाकर मांग रहे है वोट .....

मेरे कैमरे ने मुझसे कहा फैज़ कल हमारी गली में एक प्रत्याशी आए थे ...वो हमसे वोट की अपील कर रहे थे । कह रहे थे हमें वोट दीजिये हम आपके सपनो का भारत आपको देंगे ....तभी किसी युवा की आवाज़ आई महोदय पिछली बार भी आप आए थे आप ने वोट माँगा था ....हमने दिया भी पर क्या हुआ ....क्या हमारे सपनो का भारत आप हमें दे पाए । तभी किसी ने उसे चुप करा दिया ...तो नेता जी बोले नही नही उसे बोलने दीजिये सही कह रहा है ...फिर उस युवा ने कहना शुरू किया ....आपने नौकरी दिलाने के वादे किए थे सब के सब धरे के धरे रह गए ....हमारे शहर की गलियां वैसे ही बज बजा रही है जैसे पहले थी ...तो फिर क्यों हम आप को वोट दे ....

अब बारी नेता जी की थी ...वो थोड़ा सोच के बोले...हमने सभी कामो को अमली जमा पहनने की कोशिश की लकिन राज्य सरकार हमारे कामो में रोड़ा अटकाती रही ...फिर क्या था फूट पड़ा युवाओ का गुस्सा ....नेता जी के समर्थक युवाओं शांत कराने लगे ......और फिर जो होता है वो तुम भी जानते हो फैज़ ...नेता जी को सर पर पैर रख कर भागना पड़ा ....

लकिन किसी ने सच ही कहा है की ...भारत के कर्ण धार है ये युवा अगर ये जाग गए तो फिर भारत को तरक्की करने से कोई रोक नही सकता । शायद इन युवाओं की शक्ति को पहचान कर ही दुष्यंत कुमार जी ने ये बात कही है ........

इस नदी के धार में ठंडी हवा आती तो है,

नाव जर्जर ही सही लहरों से टकराती तो है।

एक चिंगारी कही से ढूंढ लाओ दोस्तों,

इस दिए में तेल से भीगी हुई बाती तो है।...........

तो दोस्तों अब जाग जाओ क्योंकि चुनाव कल है दिल खोल के मतदान करो.........

Saturday, April 11, 2009

"क्या सोचते है ये लोग "

"क्या सोचते है ये लोग "
समाज में अलग-अलग वर्ग के प्रादी होते है । वे सामान्य जन से ज़रका हटकर नज़र आते है। उनकी सोच कुछ अलग तरह की होती है । जिनमे कुछ महान होते है । मेरा कैमरा कल एक अखबार की कटिंग पढ़ रहा था । जिसमें सुधा सिंह जी ने काफी दिलचस्प लेख लिखा था इनके बारे में तो आइये मिलते है ऐसे ही कुछ लोगो से ........


१- लेखक वर्ग -
लेखक का नाम ही बेचारगी और मायूसी सेजुडा हुआ है इसके दिमाग में हमेश अपनी रचना के प्रकाशन से सम्बंधित बाते घूमती रहती है । वह सोचता है की वह जो भी रचना लिखे या छपने के लिए भेजे वह प्रकाशित हो जाये ।
वह सोचता है -
संपादक की फिर जाये मति , मेरी रचना को मिल जाये गति
२- लेखिका वर्ग - आज कल की महिलाये भी कुछ कम भी नहीं समाज का आधा हिस्सा जिसमे से कुछ लेखिका वर्ग की होती है, यह भी अपनी रचनाये प्रकाशित होने के सपने देखती रहती है। कभी कभी इनकी रचनाये सुखेद वापस भी आ जाती है तब उसके दिल क्या गुजरती है उसकी इसी सोच को दर्शाती है यह पंक्तियाँ - काश ! की संपादक मेरा शाहजहाँ होता, मेरी रचना के लिए ताजमहल नहीं
प्रेस खुलवाता


३- शराबी - एक बहुत ही अजीब किस्म का प्राणी ! दीं दुनिया से कोई मतलब नहीं , घर, परिवार, देश सामाज से कुछ लेना देना नहीं । उसकी केवल अपनी दुनिया होती है । वह उसी में अपनी संसार में खोया रहता है । उसे केवल एक ही चीज प्यारी रहती है और वह शराब वह हमेशा यही सोचता है - gaya साल दे गया मुझे गम ही गम, नए साल में मुझे मिले बस रमही रम
४- अफसर- मॉफ कीजियेगा ! किसी व्यक्ति विशेष के लिए यह नहीं है यह है ही ऐसा जीवa ऊँचा वर्ग एक बहुत ही जिम्मेदार आदमी पूरा विभाग उसके आगे पीछे नाचता है पर आखिर है तो वही आदमी न ! सांसारिक सुविधा भोगी वर्ग , कमजोरियों का पुतला , आप से कुछ भी छुपा नहीं है वह जनता है की यह गलत है फिर भी करता है । शायद वह bhi सोचता हो - हे भगवान् ! करो ऐसे विभाग में तबादला जहाँ करने को मिले नित्य प्रति घोटाले दर घोटाला ।


५- जेब कतरा- यह मेरे हिसाब से सबसे विचित्र प्राणी है कभी न कभी आप का पाला इस जीव से अवश् पढ़ा होगा याद कीजिये । याद कीजिये कोई भीड़ वाली जघन जैसे बस स्टैंड , टैक्सी स्टैंड, बाज़ार सिनेमा हाल यहाँ तक की रेस्तरां गार्डन में यह लोग मिल जाते है । शायद कभी आप को मिला हो यह यू ही पहचान में नहीं आता बहुत आत्मीता से आप से मिलेगा , आप के बहुत करीब बैठा होगा सुख दुख की बाते की होंगी विदा लेते समय आप भावुक हो गए होंगे हो सकता है आप की आँखों की कोर भीक गयी ही बाद में पता चला हो की आप ने पैसा निकालना चाह और हाथ ghusta ही चला गया हो पर्स का पता ही नहीं चला हो आप नहीं समझ सके की आप जेब कट गयी। निश्चित ही जेबकतरा यह सोचता होगा - हे भगवान् !हो जाये चमत्कार ऐसा की , लोगों की जेब से निकल ए आप ही आप पैसा।

इन बातों को सुनकर मेरा कैमरा बोला यार फैज़ तो कुछ नही कहेगा । सुधा जी ने चुनावी माहौल के बारे में कुछ नही कहा है मैंने कहा अच्छा सुन मई नेता के बारे में बताता हूँ........

१-नेता-ये बेचारा सा लगने वाला आदमी आप को चुनाव के पहले कही किसी भी चौराहे पर जनता के बीच खड़ा दिखाई देगा । उसके लिए कीचड़ भरी गलियां भी फूलो से सजी दिखाई देते है ये भैस के झुंड की तरह उसे रौंदते हुए चलता है ये जानता है की जनता बेवकूफ है । ये हमेशा यही सोचता रहता है की ......... तुम हमें वोट दो हम ,हम तुम्हे चोट देंगे

२-जनता-ये तो निरा बेवकूफ सा लगने वाला आदमी है । जब चुनाव आता है तो आश्वासनों की शहद से इतना लपेटा जाता है की उसको अपने हित-अहित का ध्यान नही देता । अपने वोट का बिना सोचे समझे इस्तेमाल करता है फ़िर सिस्टम के खिलाफ एक दम से भड़क जाता है । जब दुबारा चुनाव आता है तो फ़िर वही कार्य करती है ये हमारी प्यारी जनता इनके लिए मेरा कहना है.......... ................................ इनका है बस यही गाना ,हर साल आए चुनाव । हमें मिले मलाई और शहद

तो फिर सोचिये क्योंकि वक्त बहुत कम है ........

सोच समझ के वोट करे ........

Wednesday, April 8, 2009

जूते का टेंपो हाई है ...........

जूते का टेंपो हाई है ......................
कल एक अजब घटना घटी । मेरे कैमरे ने बताया की अब अगले साल से राष्ट्रीय जूता दिवस मनाया जाएगा .......मैंने पुछा क्यों तो वो बोला समाचार नही देखते हो क्या ....क्यों ऐसा क्या हुआ वो बोला अरे गृहमत्री श्री पी चीदाम्बरम जी पर एक प्रेस कांफ्रींस में दैनिक जागरण के रिपोर्टर जरनैल सिंह ने अपने जूते से वार कर दिया वो बाल बाल बच गए ....और उन्हूने उसे माफ़ कर दिया । अब मेरे तरह ही कुछ संस्थाए इस दिन को जूता दिवस के नाम कर देना चाहती है । .................
चलिए ये तो हो गयी मेरे कैमरे की बात पर आप प्रबुध्ज्नो का क्या कहना है इस घटना क्रम पर...ये कोई बहादुरी की बात नही है की आप किसे पर जूता चलाये ......कल जिस रिपोर्टर ने जार्ज बुश पे हुए जूते के हमले की नींदा का समाचार अपने अखबार में छापा था आज उसी ने ऐसा क्यों किया ....
क्या इस जूते ने हमारे संसकृति पर चोट नही लगायी है....क्या हमारे देश का नाम बदनाम नहीं हुआ होगा ...क्या न्याय पाने का यह तरीका सही है .......क्या इस घिनौने कृत्य से भारत माँ को तकलीफ नही हुई होगी .......सोचिये कल जो हुआ उसके लिए कौन दोषी है..................
वरना वो दिन दूर नही जब मेरे कैमरे की बात सच हो जाए और हम को जूता दिवस मनाना पड़े ........

Tuesday, April 7, 2009

कहा गए वो लोकलुभावन नारे

मेरा कैमरा अभी -अभी एक चुनावी सभा से लौटा था । मेरे पास आकर बोला फैज़ अब चुनाव की रिपोर्टिंग करने का मन नहीं करता मैंने पुछा क्यों तो कुछ देर रूक के बोला यार अब सारी चुनावी सभाएं नीरस होती है । कुछ मज़ा नहीं आता वह जाने के बाद सिर्फ नेता जी का भाषद सुनने को मिलता है। ..............मै उसकी बात सुन के बोला अच्छा तू उन पुरानी चुनावी सभाओं की बातयाद कर रहा है जहन गगनचुम्बी नारे लगाये जाते थे । ये नारे ही चुनावी समिकरद बदल देते थे । जिसने कई बार प्रत्याशियों को जिताया और हराया है । .............वो बोला हाँ यार अब तो सब नीरस हो गया है पर ऐसा क्यों मेरे समझ में नहीं आया ......मैंने कहा अरे पगले यही तो चुनाव आयोग का चुनावी डंडा है कोई भी कही भी सभा में अपनी प्रशंसा में नारे नहीं लगवा सकता । अगर ऐसा हुआ तो उसका पर्चा रद हो सकता है अगर किसे ने शिकायत की तो .....मेरा कैमरा बोला अच्छा किया फैज़ मुझे बता दिया वरना मै तो आज नारे लगा के आता .......

तो अब आप भी सचेत हो जाये क्योंकि वक़्त बहुत कम है ...........

कुर्सी की Aatmkatha

मै कुर्सी हूँ ,हर युग मै मेरा जलवा रहा है । मुझे हसीनाओं से भी ज्यादा भाव मिले है । इतीहास गवाह है की ज़्यादातर लडाइयां मेरे लिए ही लड़ी गयी है । मै सब की प्रिय हूँ ,मेरे लिए सभी जान देने को तैयार रहते है। लोगो ने मुझे हासिल करने के लिए अपने रिश्तेदारों तक को मार डाला ,माता पिता को कारगर में डलवा दिया .दोस्तों से मुह मोड़ लिया । मुझसे नाता तोड़ना बेहद मुश्किल है भले ही अपनों से नाता टूट जाये । सभी के लिए मै माननीय अपनाए । जाते है अपनाए जाते है राजनीती में जाती है । तमाम हत्कंडे अपनाए जाते है । राजनीति में बहुबल और कूटनीतिके ज़रिये मै प्राप्त होती हों । मै नेताओं की पैदल यात्राओं ,आंदोलनों ,भूख हड़तालों का इनाम हूँ । जिसने मेरी अनदेखी की उसके जीवन में अँधेरा छा गया । जिसने मुझे लात मारी वो दुनिया की लात का शीकार बना ।
मेरे लिए लोकतंत्र का जनाजा उठाया जाता है , सविधान को ठेंगा दिखाया जाता है और क़ानून को नज़रबंद कर दिया जाता है । मेरे लिए दोनों 'ध्रुव' एक हो जाते है , दुश्मनों में सुलह हो जाती है " शेर और मेमना मिल जुल कर जंगल राज बनने के लिए प्रयास करते है ।
मै कुर्सी हूँ , यानी सत्ता, हक़, सहूलियत, ऐश्वर्ये ,ख्याति ,मेरे सामने बड़े बढूँ की बूलती बंद हो जाती है, ताकतवर लाचार हो जाता है ,जानकर बे जान हो जाता है ,मेरे लिए रतून रात इमां बदल जाते है ,बैनर बदल जाते है । मै हकीकत हूँ और सब बकवास । मै ही घोशादा पत्रों का सार और विपछ की तीस हूँ ,मुझे हासिल करते ही कंगाल मालामाल और मुर्ख अक्लमंद हो जाता है , मेरे छूने से अंधे देखने लगते है । गरीबे का नामोनिशान मिट जाता है । दौलत से घर भर जाता है । बैएमानी मेरी बुनियाद है , तिकदाम्बाजी मेरा ईमान है , ज़ुल्म मेरा औजार है,झूट मेरा कवच है , घदेयाली आंसू मेरे गहने है , भ्रष्टाचार मेरी औलाद है , फरेब मेरी शान है , सलीका मेरा दुश्मन है ।
लोकतंत्र में मैदान और लडाई के तरीके बदल गए है , अब मुझे नपने के लिए जनता किए सामने "न" निओभाने वाले वादे करने पड़ते है , भूख हड़ताल और पैदल यात्राओं की भीड़ खींचू नाटक भी करने पड़ते है , गुंदू की फौज रखनी पड़ती है ,और किराये पर "जिंदाबाद" कहने वालो की भीड़ रखनी पड़ती है ।,
मै कुर्सी हूँ, जो नुझे हासिल कर लेता है उसे और कुछ पाने की इच्छा नही रहती । एक बार जो मेरी पनाह में आ जाता है वह उमर भर मेरा ही हो कर रह जाता है । मेरे पास आँख और नाक नही है इसलिए मै दुनिया की चीख नही सुन सकता । भूख नागो के हालत नही देख सकती ।
मेरे पास कपटी दीमाग और मज़बूत पैर है मै इन दूनो अंगू का भरपूर इस्तेमाल करता हूँ , अपने दीमाग से राज्नीते की बीसात बेचता इ हूँ । वीरोधियूं के कूचाक्र्र को नाकाम करते हूँ और मज़बूत पैरों से आगे वालोए कुर्सी पे बैठेने वाले को रस में सरबूर कर देती हूँ।
साहित्य के ठेकेदारून ने नौ रासो में मुझे जगह न देकर मेरा अपमान किया है । शीरिंगार रस को रस राज कहा जाता है जबकि मेरे बिना वो भी बेकार है , इसलिए साहित्य के ठेकेदारून को चाहिए की एक नए रस का खुलासा कर दे .कुर्सी रस
saabhar
Dheerendre singh

Saturday, April 4, 2009

क्या होगा अब

आ गया चुनाव ... आ गए नेता ...... सो गयी जनता ........ हमारा नेता कैसा हो .......भाई जैसा हो.......
ये नारे तो आब आम हो चुके है क्योंकि आ गया है दुनिया के चालबाजों,अमन- चैन को बेचने वालों ,जाती गत राजनीती करने वालो का महा उत्सव ....."चुनाव "फ़िर भी हमारी भोली भली जनता इनका जी जान से सहयोग देती है इन के झूठे आश्वासनों को तूफानी हवा देती है और ये जीत जाते है ........क्या जीतने के बाद ये उन लोगों का हाल पूछते है जो इनके लिए दिन रात लगे रहते है .......इस बारे में मैंने लोगों से पूछातो कुछ ने वही पुराना रटा-रटाया जवाब दिया और बोले "अरे इ साहब लोगन का चोचला है हमका तो सरकार रही तबहूँ काम करना है न रही तबहूँ".....एक दुसरे ग्रेजुएट ने कहा वोट तो हम देते है पर फर्क क्या पड़ता है । तो क्या हम जानवर से बत्तर नही है सोचिये ........मैंने कही एक कही एक कहानी पढ़ी थी वो पेश कर रहा हूँ शायद आप को पसंद आए......
एक कुत्ते ने गधे से कहा -ये कैसा जानवर है इंसान जो बात बेबात लोगों का खून बहाता है हर जगह बेमतलब की आशांति फैलाता है,अपने स्वार्थ के लिए दूसरों का बुरा चाहता है , कागज़ के एक tukade के लिए एक दुसरे को मारता है ,पेट भरा हो तो भी और खाने को मांगता है , न ख़ुद चैन से रहता है न हमें रहने देता है ,हमें तो शर्म आती है ये कहते हुए की हम इनके बीच में रहता है । हमारा बस चले तो इनका सफाया कर दे पर हने इनके जैसे संस्कार नही दिए गए ,हम तो अपनी बिरादरी के लिए जीते मरते है ,हमारी नज़रो में ये सबसे ज़्यादा बुरे है । हमें तो लात मारते है पर ख़ुद तो लात ख्हने के भी काबिल नही है.......पता नही ये जीवन क्यों देते है जब ख़ुद जीने के लायक नही ।