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Thursday, July 2, 2009

"समलैंगिक फ़ैसला"

आज मेरा कैमरा अस्पताल में भरती है ,कल रात से उसकी तबियत ख़राब है । मुझसे डॉक्टर ने पुछा की क्या हुआ है इसे तो मै बता भी नही पाया । पर आप से बताना चाहता हूँ .............

कल जब सुप्रीम कोर्ट का समलैंगिक फ़ैसला आया तभी से ये बहकी बहकी बातें कर रहा था । आखिर रात होते होते इसे तेज़ बुखार चढ़ गया । ये नींद में बडबडा रहा था की मुझे भी एक मेरी तरह का कैमरा लाके दो । मै बहुत परेशान हो गया और उसे यहाँ ले आया ।

खैर ये तो मेरा कैमरा था लकिन आप क्या कहते है इस समलैंगिक सरकार के इस समलैंगिक फैसले के बारे में । क्या प्रकृति के नियमो के विरूद्व जाना सही है । क्या संस्कृति प्रधान देश में ये सब करना उचित है । जिस तरीके से हाईकोर्ट ने समलैंगिक सबंधों को अपराध करार देने वाले १४९ वर्ष पुराने कानूनों को बुनियादी अधिकारों का उलंघन बताया है, क्या वो सही है। हाईकोर्ट की न्यायाधीश ऐ.पी.शाह और एस .मुरलीधर की पीठ ने कहा की १४९ वर्ष पुर्व जारी क़ानून ३७७ सविधान की धारा १४,१५,१९ वा २१ का उलंघन करती है जिसमे मानवाधिकार की बात की गई है । ..........

angrezon ने जो १४९ वर्ष पहले क़ानून बनाया था शायद वो सही था , सन १९४१ में उर्दू लेखिका इस्मत चुग़ताई को अपनी कहानी "लिहाफ"के लिए सज़ा भुगतनी पड़ी थी जो इसी समलैंगिक रिश्तों पर आधारित थी । क्या कभी किसी ने ये सुना है की किसी जानवर ने भी ऐसा किया है ...जब हमारे इस पवत्र संस्कृति वाले देश में जानवर भी इसे पाप समझते है तो फिर हम आप कौन होते है प्रक्रति के नियमो से छेड़ छाड़ करने वाले । कुछ लोगों ने खजुराहो की मूर्तियों की बात कही है की जो समलैंगिकता का विरूद्व करते है उन्हें खजुराहो की मूर्तियों देखनी चाहिये । उनसे कोई ये पूछे की तब गुरू को भगवान् का दर्जा मिलता था अब क्यों नही मिलता , तब नारी देवी सामान थी अब क्यों नही , तब लोग रजा और राज्य के प्रति समर्पित थे अब क्यों नही , तब राजा प्रजा का बराबर से दयां रखता था कोई उसके लिए अलग नही था । तो सिर्फ़ इसी बात के लिए क्यों याद आई खजुराहो की मूर्तियाँ ।

वही कुछ समय पहले जिस सरकार ने इस फैसले पर असहमति दिखाई थी वही इसके साथ खड़ी दिखी , तब उसने कहा था की इससे ऐड्स के के मरीजों में वृद्धि होगी ,साथ ही उसने जाम्बिया का आकडा भी रखा था जहा ३३ प्रतिशत समलैंगिक ऐड्स का शिकार है । ऐड्स संघ ने कहा है की भारत में समलैंगिकता पर से कानूनी रोक हट जाने से सबसे अधिक फायदा ऐड्स के छेत्र में होगा लोग अब इस पर खुल के बात करेंगे । अब उनसे कौन कहे की हमारे यहं परिवार नियोजन की इतनी बड़ी समस्या है उस पर तो कोई खुल के बात नही करता तो इस पर क्या करेंगे । चाहे जो हो मै तो यही कहूँगा की हमें कोई हक नही है हम प्रकृति के नियमों के साथ खिलवाड़ करे । चलिए डाक्टर साहब आरहे है मै अपने कैमरे की तबियत पूछ लूँ और आप इस विषय पर चिंतन कीजिए और मुझे बताइए ....................

11 comments:

Science Bloggers Association said...

फैंटेसी अच्‍छी है, पर मुझे नहीं लगता कि किन्‍ही दो लोगों की निजी जिन्‍दगी में दखलन्‍दाजी करने का हमारा कोई अधिकार बनता है।

-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }

Science Bloggers Association said...

फैंटेसी अच्‍छी है, पर मुझे नहीं लगता कि किन्‍ही दो लोगों की निजी जिन्‍दगी में दखलन्‍दाजी करने का हमारा कोई अधिकार बनता है।

-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }

पंगेबाज said...

दो आदमी एकट्ठे वो काम कर सकते है जिसके लिये उन्हे खुदा ने नही बनाया ये उनका निजी मामला है एक अकेला मरने का फ़ैसला करले जिसके लिये खुदा भी उन्हे अपराधी नही ठहराता ( मरने का ) ये अपराध है :)

अंशुमाली रस्तोगी said...

बंधु, अगर समलैंगिक संबंध प्रकृति के विरूद्ध है तो क्या बलात्कार, यौन शोषण क्या ये सब प्रकृति और पुरुष की सोच के अनुकूल है। आखिर हम बदलाव के रास्तों पर चलने से घबराते क्यों हैं?

मिहिरभोज said...

बंधु अभी तो और भी कई मंजिले पार करनी हैं हमें...हो सकता है थोङे दिन बाद गंधर्व विवाह(जबर्दस्ती या बलात्) को भी कानूंनी स्वीकृति मिल जाये

वेद रत्न शुक्ल said...

KRIPYA UPAR KI PANKTIYON ME SUPREME COURT KI JAGAH HIGH COURT KAR LEN.

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

आलेख अच्छा लिखा है। लेकिन समलैंगिकता को मान्यता किस ने दी है? केवल निजता में वयस्कों के सहमत लैंगिक व्यवहार को दंडनीय अपराध की श्रेणी से हटाया है। जो उचित ही लगता है।

डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर said...

यदि आप समय निकाल सकें तो समलैंगिकता पर कुछ हमने भी लिखा है, देखिएगा।

डॉ. मनोज मिश्र said...

यह चर्चा वाली पोस्ट है.

mahashakti said...

भारत के परिपेक्ष में समलैगिकता को बढ़ावा नही दिया जाना चाहिये। कल पुरूष-पुरूष और महिला महिला गलबईया डाले दिखेगे तो यह कितना उचित होगा ? 377 हटा कर यह कहना कि अब आदमी और आदमी विवाह कर सकते है तो मै इसे नही मानता। अच्‍छा लिखा है

Babli said...

बहुत बढ़िया लिखा है आपने! इस लाजवाब पोस्ट के लिए बधाई!