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Wednesday, March 17, 2010

"भारतीय सिनेमा जगत के पोस्टर - बदलता चेहरा भाग ३"

आएये बात को आगे बढ़ाते है आज हम बात करेंगे पुरानीफिल्मो की जिन फिल्मो में हीरो की ही-मैन की छवि पेश की जाती थी यानि हीरो हमेशा उची उची फेकम्छाप मचाये रहता था । ओं फिल्मो के पोस्टरों में हीरो या तो अकेला दिखाई पड़ता था या फिर अपनी माँ के आँचल में सर छुपाये बैठा रहता था । या हीरो के माँ बाप विलेन के आगे अपने जाते जाते तो ये हुए दिखाए जाते थे, साथ में हीरो का बचपन का सीन होता था जो अपनी माँ को छुड़ाने की भरपूर कोशिश करता था । या सबसे ज्यादा सिर्फ और सिर्फ हीरो - हिरोइन ही पुरे पोस्टर पर अपना कब्ज़ा जामये रहते थे , जिसमे एक दो भाव्पूर्द दृश्य होते थे । मैंन पोस्टरों को तो नहीं देखा उस ज़माने के लेकिन हाँ इन्ही दिनों मेरे हाथ में प्रदीप कुमार जी की एक यादगार फिल्म "भीगी रात " लग गयी फिर क्या था मैंने पूरी फिल्म देखि तब समझ में आया की क्या होता होगा उस ज़माने के पोस्टर में । उस फिल्म कॉलेज से ताज़ा ताज़ा निकले प्रदीप कुमार जी मीना कुमारी जी से इश्क फरमाते है । एक सीन में अशोक कुमार जी को बताते है की मे कॉलेज में निशाने बाज़ी में चैम्पियन था तो दुसरे में तैरने में यानी की अगर पढाई की बात हो तो वहां भी चैम्पियन था यानि हर छेत्र में चैम्प ,लेकिन मैंने अपने एक बुज़ुर्ग से पुछा की क्या कभी पुराणी फिल्मो के पोस्टरों पर हीरो का कॉलेज गोइंग सीन होता था की नहीं तो वो बोले अरे बिटवा अगर इ सीन पोस्टर पर दिखाए तो फिलिम कौनो नहीं देखे जाते सब तो विलेन का वाद विवाद देखने जाते या फिर उनकी लव स्टोरी देखने जाते....कुल मिलाकर हम कह सकते है की पुराने ज़माने में पोस्टर लव और रोमांस के चक्कर में पड़ा हुआ था
तो ये था तीसरा भाग अगला भाग जल्द ही लिखने की कोशिश करेंगे हम दोनों जहाँ बंगला सिनेमा के पोस्टरों की बात होगी ।
आप सभी को मेरे और मेरे कैमरे की तरफ से नूतन वर्ष की हार्दिक शुभकामनाये .........

3 comments:

kunwarji's said...

bahoot kareeb se mehsoos kar rahe ho faiz bhai sahaab ye parivartn..
shubhkaamnaaye swikaar humaari bhi..
kunwar ji,

डॉ. मनोज मिश्र said...

BADHIYA PRASTUTI.

Babli said...

बहुत सुन्दर भाव और अभिव्यक्ति! उम्दा प्रस्तुती!